प्रतिलिप्याधिकार/सर्वाधिकार सुरक्षित ©

इस ब्लॉग पर प्रकाशित अभिव्यक्ति (संदर्भित-संकलित गीत /चित्र /आलेख अथवा निबंध को छोड़ कर) पूर्णत: मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित है।
यदि कहीं प्रकाशित करना चाहें तो yashwant009@gmail.com द्वारा पूर्वानुमति/सहमति अवश्य प्राप्त कर लें।

यदि आप चाहें तो हमें कुछ सहयोग कर सकते हैं

19 December 2021

कंक्रीट की सभ्यता

(1)
हर रात
रोशनी के नशे में डूबकर
कंक्रीट की सभ्यता
करती है गुफ्तगू
मखमली पर्दों के बाहर पसरे
सन्नाटे के साथ
खोलती है
अपने भीतर की दुनिया की
कुछ अनकही-
अनदेखी परतें
जिनके ऊपर के मुखौटे
जब मुखातिब होते हैं
दिन के उजाले में
तो ऐसा लगता है
जैसे किसी ऊंचे पेड़ की
हरभरी पत्तियां
शायद अब तक अनजान हैं
सूखती जड़ों
और तने के
खोखलेपन से।

(2)
कंक्रीट की सभ्यता!
हाँ! यह वह सभ्यता नहीं
जो अगर कभी दफन हुई
और अगर कभी
हमारा आधुनिक वर्तमान
प्राचीन हुआ
तो शायद ही 
भविष्य को मिल सकेंगे
विध्वंस के अवशेष
क्योंकि हमने
समय से पहले ही
समय को निचोड़ कर
अपने अमरत्व से
छीन लिया है
भावी 
जीवाश्मों का 
पुनर्जीवन।
.
चित्र व शब्द: 
यशवन्त माथुर©
18122021
.

17 December 2021

वर्तमान समय में शिक्षा की उपयोगिता

शिक्षा मनुष्य की नैसर्गिक और सार्वभौमिक आवश्यकता है। अपने जन्म से मृत्यु पर्यन्त हम किसी न किसी रूप में कुछ न कुछ सीखते ही रहते हैं। चाहे वह माता-पिता की गोद में सभ्यता के स्वाभाविक पाठ सीखना हो या परिवार और मित्रों के परिवेश में ढलना। जो कुछ भी हम सीखते हैं वह शिक्षा ही है। लेकिन क्या सभ्यता और सामाजिक परिवेश के पाठ सीखना ही शिक्षा है? क्या यही शिक्षा की उपयोगिता है? आपका जवाब हां या न कुछ भी हो लेकिन शिक्षा को किसी भी सीमा में बांधा नहीं जा सकता।

 वर्तमान में शिक्षा का उद्देश्य या कहें कि उपयोगिता सिर्फ धनार्जन के एकमात्र लक्ष्य की पूर्ति करना ही रह गया है।और इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए शिक्षार्थी पर परिवार और समाज का भरपूर दबाव रहता है, चाहे उसकी पृष्ठभूमि कैसी भी हो। कुछ इस दबाव को झेल लेते हैं और आगे बढ़ जाते हैं वहीं कुछ ऐसे भी होते हैं जो इस कदर दब जाते हैं कि फिर कभी उठ ही नहीं पाते। और जो उठ नहीं पाते, जो धनार्जन की प्रतियोगिता में पिछड़ जाते हैं, वे अंततः अकेले ही रह जाते हैं। परिवार और समाज का असहयोगात्मक रवैया उन्हें एकाएक मानसिक तनाव की ओर धकेल देता है जिसकी परिणति किसी भी दशा में सकारात्मक तो हो ही नहीं सकती।

तो ऐसे में कोई क्या करे? क्या धनार्जन न करे? क्या सामाजिक और पारिवारिक शिष्टाचार सीख कर कोई अपना निर्वाह कर सकता है? उत्तर सिर्फ एक ही है- संतुलन। क्योंकि असंतुलन का ही हास्यास्पद परिणाम तब देखने को मिलता है जब अच्छे खासे उपाधिधारक विद्वतजन भी अनपढ़ों के चक्रव्यूह में फंसकर उससे पार पाने को छटपटाते नजर आते हैं। इसलिए संतुलन के साथ ही शिक्षा के मूलभूत उद्देश्य और इसकी उपयोगिता को सार्थक बनाया जा सकता है।

[फ़ेसबुक ग्रुप भाव कलश पर 'शिक्षा की उपयोगिता' विषय पर आधारित चर्चा के लिए लिखा गया]

-यशवन्त माथुर©
17122021 

08 December 2021

कुछ लोग-55

कुछ लोग
लगते हैं
देखने से भले
व्यवहार से
हितैषी
लेकिन उनके भीतर
पलता रहता है
विद्वेष
जिसकी झलक
कभी न कभी
दिखती है
उनकी कथनी- 
करनी के अंतर
और उनके चेहरे पर
उभर कर मिटती
आड़ी-तिरछी लकीरों के
आवागमन से। 
यूं तो
विद्वेष
होता है
स्वाभाविक भी
फिर भी
कुछ लोग
अधिकतर नहीं होते संतुष्ट
अपने 
और किसी और के
सुख-दु: ख की
चारित्रिक 
असंगतता से।

-यशवन्त माथुर©
08122021

Popular Posts

+Get Now!