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20 December 2013

सन्नाटे को तोड़ना है

आओ चलें कि, सर्द हवाओं का रुख मोड़ना है
आज नहीं तो कल, इस सन्नाटे को तोड़ना है

यह वक़्त खामोशी का नहीं,मूंह खोलने का है
जो कुछ दबा छुपा मन में, सब बोलने का है

कुबूल सच तो था पहले भी, इन्कार कब है
झूठ की हवेली में अदालत की, दरकार कब है

सब काबिल हैं यहाँ , माहिर अपने फन के
महफिल में सजे हुए, मोम के पुतले बन के

लहरों का ले हथोड़ा, पत्थर दिल पर वार कर
बनेगा नया इक रस्ता, हर कल को संवार कर

आओ चलें कि, इस कुहासे को झकझोरना है
अपनी कदमताल से, हर सन्नाटे को तोड़ना है ।

~यशवन्त यश©

14 comments:

  1. बहुत बढ़ियाँ रचना ...
    सन्नाटे को चीरकर खुशियों के गीत गुनगुनाना है ...
    :-)

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  2. वाह... बहुत खूब।

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  3. गजब कि चाह और जीवंतता

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  4. वाह बहुत बढिया...

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  5. छंट जाये हर कुहासा...धूप की ऐसी हो वर्षा..बहुत सुंदर प्रेरित करते भाव !

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  7. प्रेरित करते भाव. शुभकामनाएँ.

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  8. बहुत खूब लिखा है.. तोड़िये इस मनो-जेल को..

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  9. आओ चलें हम..सन्नाटे को तोड़ना है..
    बहुत सुंदर रचना..

    सादर प्रणाम

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