प्रतिलिप्याधिकार/सर्वाधिकार सुरक्षित ©

इस ब्लॉग पर प्रकाशित अभिव्यक्ति (संदर्भित-संकलित गीत /चित्र /आलेख अथवा निबंध को छोड़ कर) पूर्णत: मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित है।
यदि कहीं प्रकाशित करना चाहें तो yashwant009@gmail.com द्वारा पूर्वानुमति/सहमति अवश्य प्राप्त कर लें।

यदि आप चाहें तो हमें कुछ सहयोग कर सकते हैं

02 July 2018

काश! कि न होती ये बारिश

काश!
कि न होती ये बारिश
तो
न मन यूं भीगता
न भीतर ही भीतर
चीखता
मुक्ति पाने को
काले बादलों की तरह
उमड़ते
अनचाहे शब्दों से ।
हाँ !
अनचाहे शब्द
जो तितर-बितर
हो कर
न जाने
किस तरह जुड़ कर 
असपष्ट सा आकार लेते हैं
न जाने क्या समझते हैं
न जाने क्या समझाते हैं।
काश!
कि न होती ये बारिश
तो न जमती
द्वेष और हीनता की
काई और कीचड़
टूटे दिल के
उस एक कोने में
जो लाख समझाने पर भी
मानता नहीं
कि हकीकत
कहीं हटकर होती है
कल्पना से।
काश!
कि न होती ये बारिश
और बना रहता
अस्तित्व
जेठ की तपती दोपहरों का
तो सुकुं मिलता मुझको
सिर्फ यह सोचकर
कि
इस कदर
जलने वाला
अकेला मैं ही नहीं
और भी हैं।

-यश ©
02/07/2018



2 comments:

  1. बहुत सुंदर भावपूर्ण रचना..बारिश को देखने क एक नया अंदाज..

    ReplyDelete

Popular Posts

+Get Now!