विषयों की तलाश में
भटकता हुआ
किसी कोने में
कहीं अटकता हुआ
बेसुध सा मन
यहाँ-वहाँ
सब जगह
ढूँढता है
'कुछ'
जो अभिप्रेरित करे
कहने को
अंतर्मन की बात।
बात!
जिसे
कहीं देखा गया हो
सुना गया हो
महसूस किया गया हो
जिसकी शाखाओं से निकलें
विषयों के उपविषय
और जिसमें समाहित हो
प्रस्तावना से उपसंहार तक का
पूरा वृतांत और सार।
बस
कोरे मन के
सूक्ष्मतम कण को
गर मिल सके
कोई एक विषय
तो निर्मित हो सकेगा
कई ब्रह्मांडों के
अतिशयोक्ति रहित
सृजन और संहार का
अंतहीन चक्र।
070526
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