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06 November 2014

बीते दौर की बातें

कभी कभी
बीते दौर की कुछ बातें
यादों के बादल बन कर
छा जाती हैं
मन के ऊपर
बना लेती हैं
एक कवच
रच देती हैं
एक चक्रव्यूह
जिसे भेदना
नहीं होता आसान
नये दौर की
नयी बातों के लिये ।
मन !
उलझा रहता है
सिमटा और
बेचैन रहता है
भीगने को
अनंत शब्दों की
तीखी बारिश में
जो अवशेष होते हैं
उड़ते जाते
उन बादलों के
जिनके भीतर
छुपा होता है
इतिहास 
उस आदिम
दौर का
जब चलना सीखा था
कल्पना की
दलदली धरती पर
कलम की
बैसाखी लेकर ।
मैं !
आज भी चल रहा हूँ
कल भी चलूँगा
चलता रहूँगा
पार करता रहूँगा 
उस दौर से
इस दौर के
नये चौराहे
मगर
इस थकान भरे सफर में
थोड़ा रुक कर
थोड़ा थम कर
आत्म मंथन के
अल्प अवकाश को
साथ ले कर
कभी कभी
बीते दौर की कुछ बातें
छा जाती हैं 
यादों के
बादल बन कर।
  
~यशवन्त यश©
owo04112014 

10 comments:

  1. कभी खुशी तो कभी गम दे जातीं हैं ....ये बीते दौर की बातें !

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (07.11.2014) को "पैगाम सद्भाव का" (चर्चा अंक-1790)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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  3. यादों के ये बादल जब बरस जायेंगे तब मन की धरती पर खिलेंगी नये उत्साह से नये दौर की बातें भी...सुंदर रचना !

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  4. अद्भुत लेखनी :)

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  5. विचारणीय , बीता हुआ भी साथ ही चलता है

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  6. सुन्दर मंथन भावनाओं का

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  7. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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