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19 September 2019

उम्मीदें और हम ......

हमारा आज
हमारा कल
हमारा हर पल
चलता है
तो सिर्फ
उन उम्मीदों के साथ
जो
समय का हाथ थाम कर
सिर्फ बढ़ती ही जाती हैं
मृगतृष्णा में
धकेलती ही जाती हैं
और हम
बस उन उम्मीदों के
पूरा होने की चाहत लिए
धँसते ही जाते हैं
फँसते ही जाते हैं
एक अजीब से भंवर में
जहाँ रोशनी नहीं
सिर्फ अंधेरा है
गहरा अंधेरा
दूर-दूर तक
किसी लकीर के
नामो-निशां के बिना
हमें
बस उतरना ही होता है
उठना नहीं,
क्योंकि
हमारा गिरना
द्योतक होता है
उम्मीदों के टूट कर
बिखरते जाने का।

-यश©
19/09/2019  

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