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10 February 2022

दौर बदलना बाकी है ...


कितना कुछ लिख डाला 
और कितना लिखना बाकी है 
शब्दों के मयखाने में 
और कितना पीना बाकी है। 

करता कोशिश कुछ कहने की
लेकिन सुनना बाकी है 
बन जाए जिनसे कोई कविता 
वो अक्षर चुनना बाकी है।  

देखो बसंत की इस हवा को 
और कितना बहना बाकी है 
दूर नहीं दोपहर जेठ की 
बस दौर बदलना बाकी है। 

-यशवन्त माथुर ©
10022022 

8 comments:

  1. बहुत सटीक,सुंदर सराहनीय कृति ।

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  2. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (११ -०२ -२०२२ ) को
    'मन है बहुत उदास'(चर्चा अंक-४३३७)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  3. वाह! वाक़ई शब्दों में रस की खान है बस पीने का हुनर चाहिए और यह कि सुनते-सुनते ही कहने का ढंग आ जाता है, वक्त बदलते देर नहीं लगती, अभी निकला सूरज अभी ढल जाता है

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  4. देखो बसंत की इस हवा को
    और कितना बहना बाकी है
    दूर नहीं दोपहर जेठ की
    बस दौर बदलना बाकी है।

    बिल्कुल सही कहा आपने!
    बहुत ही शानदार सृजन...

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  5. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति।

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  6. काव्यपाठ बहुत ही बढ़िया है 👌👌

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  7. अच्छा लगा सुन कर. नवीन प्रयोग.
    सुनने का आनंद ही कुछ और है.
    शुभकामनाएं.

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  8. "कितना कुछ लिख डाला
    और कितना लिखना बाकी है
    शब्दों के मयखाने में
    और कितना पीना बाकी है। "

    वाह क्या बात है !

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