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10 February 2026

इंसान और कुत्ता


इंसान 
इंसान होता है 
और 
कुत्ता, 
कुत्ता होता है 
दोनों प्रजातियों में 
स्वाभाविक अंतर होता है। 
इंसान 
जन्म से 
मरण तक 
कभी खुश होता है 
कभी रोता है 
संघर्षों में 
गिरता है 
उठता है 
चलता-फिरता है 
जागता है 
सोता है 
कुत्ते के साथ भी 
ऐसा ही होता है। 
कुत्ता 
दौड़ता है 
भागता है 
आवरगर्दी करता है 
खुले आसमान के नीचे 
जागता है 
सोता है 
दुखी होता है 
तो खुल कर रोता है 
किसी का डर 
उसको नहीं होता है। 
कुत्ता, 
कुत्ता ही होता है 
उसे नहीं होती 
नौकरी की चिंता 
न घरवालों की चिंता 
नहीं होता 
नातों-रिश्तों का झमेला 
उसके जीवन में 
न परीक्षा का झंझट 
न ही प्रतिशत का 
उसे एहसास नहीं होता 
भूख का 
न प्यास का 
उसे शरण देने वाला 
कोई अमीर इंसान 
उसे सुला सकता है 
मखमली गद्दे पर 
और कोई फुटपाथिया 
उसे तकिया बना कर 
खुद सोता है 
रख कर सिरहाने पर। 
इंसान 
सिर्फ अमीर ही अच्छा होता है 
और गरीब इंसान से 
लाख गुना बेहतर होता है 
आज के दौर में 
आवारा कुत्ता होना। 
.
-यशवन्त माथुर© 
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08 February 2026

कुछ लोग-60

कुछ लोग 
वक़्त से 
पाले रहते हैं उम्मीदें 
इस आस में 
कि उसके बीतने या 
बदलने के साथ ही 
बदल सकेगा 
कुछ अपनों का 
चरित्र -
चेहरा और सोच;
लेकिन 
प्रगीतिशीलता के मुखौटे 
और काली वास्तविकता का 
बड़ा अंतर,
पुरातन रूढ़िवादिता ,
अहं और सर्वोच्चता की 
अवधारणा 
शायद  
निकलने नहीं देती  
कुछ लोगों को 
उनके बाह्य आवरण से बाहर 
और शायद इसीलिए 
उनके अपनों की 
उम्मीदें तोड़ देती हैं दम 
चरम पर पहुँचने के 
बहुत पहले
छटपटाते हुए ।  

-यशवन्त माथुर© 
08022026 
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10 January 2026

जरूरी है......

जरूरी है
दिन, दोपहर और 
उजाले से परे
कभी -कभी
अंधेरे का होना
घने कोहरे का होना
और एकांत का कोना
जहां 
आत्ममुग्धता के चरम पर
आत्मचिंतन की -
वास्तविकता में
मेरे जैसा कोई
चख सके स्वाद
नीम जैसी-
वास्तविकता का।
.
~यशवन्त माथुर©
10012026

04 January 2026

गलतियाँ ........

कुछ गलतियाँ 
गलती से हो जाती हैं 
कुछ नासमझी,
नादानी से 
कुछ भावनाओं में बहकर 
अनचाहा ही 
कुछ कहकर 
कुछ गलतियाँ 
छोड़ जाती हैं 
अपनी खरोंचों के निशान 
ऐसी जगहों पर 
जिनपर नजर पड़े बिना 
पूरा नहीं होता 
किस भी रास्ते पर 
कोई भी सफर। 

-यशवन्त माथुर© 
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01 January 2026

नव वर्ष

नयी उम्मीदों के साथ 
नयी बातों के साथ 
नए ख्यालों के साथ 
ख्वाब सबके पूरे हों ।
 
जो बरसों से अधूरे रहे 
अनकहे-अनसुने रहे
चाहे जितने प्रकार हों 
शब्द सब  साकार हों। 

नया सूरज कुछ कहता रहे 
हर दिन कुछ बनता रहे  
रात का अंधेरा छँटता रहे 
प्रेम भाव बँटता रहे। 

नववर्ष!
आशा का प्रतीक हो
उल्लास से व्यतीत हो 
तिनका-तिनका खुशियों से 
घर-आँगन रोशन हो। 

~यशवन्त माथुर©
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