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18 February 2013

उन्हें कुछ नहीं पता.....

उन्हें कुछ नहीं पता
क्या धर्म
क्या जात की ऊंच नीच
क्या गोरा क्या काला
अमीर या गरीब
उन्हें मतलब नहीं
भाषा या देश से
संस्कृति और परिवेश से
न राग से न द्वेष से  
उनका मन सिर्फ
उनका ही मन है
खुद में ही मस्त है
खुद मे ही मगन है
उन्हें लोटना है ज़मीन पर
तुतलाना है , ठुमकना है
अपनी ही दुनिया मे जीना
बच्चों का बचपना है
कभी था यह सब
खुद की हकीकत
अब यह सब  एक सपना है !

©यशवन्त माथुर©

13 comments:

  1. बिल्कुल....अब यह सपना ही है

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  2. आभार बहुत खूब कहा अपने
    आपको बहुत बहुत बधाई
    मेरी नई रचना
    फरियाद
    एक स्वतंत्र स्त्री बनने मैं इतनी देर क्यूँ
    दिनेश पारीक

    ReplyDelete



  3. आभार बहुत खूब कहा अपने
    आपको बहुत बहुत बधाई
    मेरी नई रचना
    फरियाद
    एक स्वतंत्र स्त्री बनने मैं इतनी देर क्यूँ
    दिनेश पारीक

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  4. बच्चों के निर्मल भावों की सुन्दर प्रस्तुति.

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  5. निश्छल बचपन ही श्रेष्ठ है |बढ़िया

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  6. उस निश्चलता का एक अंश भी अगर हमें समां जाये ....तो शायद जीने का ढंग बदल जाये ....:)

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  7. सुन्दर रचना...

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  8. ज़िन्दगी के सबसे अच्छे दिन होते हैं वो.

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  9. बच्चों सा निर्मल बन पाना .....एक सपना सा ...
    सुंदर रचना यशवंत ...!!

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  10. सुंदर रचना, बचपन हर गम से बेगाना होता है...

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  11. sach me...bachpan ab 1 sapna hi h...jo kabhi haqikat nahi ban sakta :(

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