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07 April 2014

आओ चलें


लोक का त्योहार है
आओ चलें
तंत्र की यह पुकार है
आओ चलें
माना अलग विचार हैं
आओ चलें
धारा को जो स्वीकार है
आओ चलें
धूप या बरसात में
आओ चलें
बर्फ की बौछार में
आओ चलें
हर वेश में परिवेश में
आओ चलें
स्वतन्त्रता तैयार है 
आओ चलें
हर कोई होशियार है
आओ चलें
इससे पहले कि पछताएँ
आओ चलें 
इस काम में क्यों शरमाएँ
आओ चलें 
आओ चलें आओ चलें
आओ चलें
मतदान का कर्तव्य
हर हाल में पूरा करें
आओ चलें ।

~यशवन्त माथुर ©

04 April 2014

आपका मत अनिवार्य है....यशोदा अग्रवाल

यशोदा दीदी के ब्लॉग से उनकी यह रचना (http://4yashoda.blogspot.in/2014/04/blog-post_3.html) 
बिना अनुमति यहाँ भी संकलित कर रहा हूँ। 
आशा है कि इस ब्लॉग के सम्मानित पाठकगण उनकी इस रचना के मर्म को समझेंगे और इन चुनावों में मतदान के अपने कर्तव्य को निभाएंगे भी। 



आपका मत
अनिवार्य है....


महिला हों या
पुरुष, आप
चुनावों के जरिये
चुनी जाने वाली
सरकार....
व्यक्ति विशेष नहीं
हर व्यक्ति
के जीवन को
प्रभावित करेगी।

फिर हम
इन चुनावों से
अछूते क्यों रहें !!

आईये...
इस मत-महोत्सव
को सफल बनाएँ
सोच-समझकर
न्याय पूर्वक
मतदान करें....
और लोकतंत्र के
इस अद्भुत
मत-महोत्सव में
अपनी भागीदारी
दर्ज करें

और ध्यान रखें
कभी भी
नोटा का
उपयोग न करें
इससे आपका नहीं
अयोग्य प्रत्याशी
का भला होगा....

-यशोदा ©
(प्रेरणा प्राप्त मधुरिमा से)

02 April 2014

वक़्त के कत्लखाने में -5

वक़्त के कत्लखाने में
कैद जिंदगी
कभी कभी देख लेती है
उखड़ती साँसों की
खिड़कियों के
पर्दे हटा कर
बाहर की दुनिया
और हो जाती है हैरान
झोपड़ियों को घूरती
महलों की नज़रें देख कर ....
आज नहीं तो कल
फूस के ये नन्हें मकान
या तो खिसक जाएंगे
दो कदम आगे
या तो बदल लेंगे
खुद का रूप
या सिमट जाएंगे
लॉन की
हरी घास बन कर ....
शायद इसीलिए खुश है
जिंदगी
उखड़ती साँसों के
पर्दे डली
खिड़कियों के भीतर
वक़्त के कत्लखाने में
जिसके अंधेरे तहखाने की
सीढ़ियाँ
चढ़ती-उतरती है
अपनी मर्ज़ी से
बाहर के अंधेरे-उजालों से
बे परवाह हो कर।

~यशवन्त यश©

01 April 2014

वक़्त के कत्लखाने में - 4

टंगा हुआ है
एक आईना
वक़्त के कत्लखाने में
देख कर जिसमें
खुद का अक्स
अक्सर गुनगुनाती है जिंदगी
बीते दौर के नगमे
जो सहेजे हुए हैं
मन की एल्बम के
हर पन्ने पर .....
इन नगमों में
दर्द है
मस्ती है
बहती नदियां
और उनमें
तैरती कश्ती है
जो चलती जा रही है
अपनी मंज़िल की ओर
भँवरों में फंस कर
उबरते हुए
तेज़ लहरों में डगमगा कर
संभलते हुए .....
इन नगमों में
तस्वीरें हैं
उस बीते दौर की
जब खिलखिलाती थी
जिंदगी
हलाल होने को
वक़्त के
इसी कत्लखाने में।

~यशवन्त यश©

26 March 2014

वक़्त के कत्लखाने में -3

वक़्त के कत्लखाने में
सांसें गिनती जिंदगी
कितने ही एहसासों को
खुद के भीतर दबाए
हर पल
मांगती रहती है मन्नतें
इस दुनिया के पार जाने की
लेकिन
तैयार नहीं
देने को
इम्तिहान
तो विकल्प क्या ...?
हाँ विकल्प है
सिर्फ एक ही विकल्प
कि वक़्त के कत्लखाने में
सांसें गिनती जिंदगी 
वक़्त से पहले ही
उम्मीदों की 
सबसे ऊपरी मंज़िल से 
कूदकर नीचे
हो जाए मुक्त
इन तमाम झंझटों से।

~यशवन्त यश©

23 March 2014

वक़्त के कत्लखाने में -2

वक़्त के कत्लखाने में
सिमट कर बैठने की
कोशिश करती रूह
चाह कर भी
नहीं निकल पाती बाहर
बंद पिंजरे से ...
हो नहीं पाती आज़ाद
कई कोशिशों के बाद भी ....
वह मजबूर है
सुनने को
पल पल बिंधती देह की 
आहें....
जो बढ़ती ही जाती हैं
उम्र के ढलान पर ....
उभरती झुर्रियों के
खंजर
झेलने होंगे
आखिर कब तक ?
और
आखिर कब
कामयाब होगी
यूं फैली बैठी हुई रूह
पूरी तरह सिमट कर
अपने वर्तमान को
मिट्टी में मिलाने में .....
वो पल भी आएगा
अपने तय पल पर
मुझे इंतज़ार है
बेसब्री से
जब यह एहसास
लुढ़के पड़े मिलेंगे
किसी रोज़ ....
वक़्त के कत्लखाने में । 

~यशवन्त यश©

20 March 2014

वक़्त के कत्लखाने में-1

वक़्त के कत्लखाने में
कट कट कर
ज़िंदगी
नयी उम्मीदों की आस में
झेलती है
यादों के चुभते
हरे ज़ख़्मों की टीस....
ज़ख्म -
जिनके भरने का
भान होते ही
उन पर छिड़क दिया जाता है
नयी नयी बातों का
आयोडीन रहित
ताज़ा नमक....
जो कैद रखता है
दर्द को
नसों में भीतर तक
फिर भी निकलने नहीं देता
मूंह से एक भी आह
क्योंकि
वक़्त के कत्लखाने में
कट कट कर
ज़िंदगी
सुन्न ज़ुबान 
और सिले हुए होठों से 
बयां नहीं कर सकती 
अपनी तड़प 
बस
झेलती रहती है 
यादों के चुभते
हरे ज़ख़्मों की टीस
आज़ाद हो कर 
मुक्त आकाश में 
उड़ने की 
तमन्ना लिये। 

~यशवन्त यश©

17 March 2014

देखो होली का हुड़दंग


  लाल हरा पीला नीला
थोड़ा सूखा थोड़ा गीला
भर पिचकारी उड़ता रंग
देखो होली का हुड़दंग

बच्चा बच्चा भीगा भीगा
थोड़ा मस्त थोड़ा खीझा
गली गली में होती जंग
देखो होली का हुड़दंग

जैकब गुरमीत फरहा सीता
ठंडाई हर कोई पीता
प्लेट में गुझिया मस्त तरंग
देखो होली का हुड़दंग

खुशी से सबका गहरा नाता
त्योहार हमको यही बताता
मिलकर गले बिखरता रंग
देखो होली का हुड़दंग। 

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आप सभी को सपरिवार होली मुबारक
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~यशवन्त यश©

09 March 2014

हर कोई है यहाँ अपने मे मशगूल

हर कोई है यहाँ
अपने मे मशगूल
किसी को बीता कल याद है
और कोई
आज मे ही आबाद है
कोई डूबा है
आने वाले कल की चिंता में
कोई बेफिकर
देखता जा रहा है
मिट्टी के पुतलों के भीतर
छटपटाती आत्माओं की
बेचैनी ।

हाँ
हर कोई है यहाँ
मशगूल
बदलते वक्त के साथ
दर्पण में
खुद की बदलती
तस्वीर देखने में
पर सच तो यही है
कि इन तस्वीरों का यथार्थ
दिल दिमाग के
बदलने पर भी
नहीं बदलता
रंग रूप की तरह।

 ~यशवन्त यश©
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