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04 June 2015

मन के साथ चलता हूँ ..........

बस यूं ही
मन के साथ चलता हूँ
कहता हूँ
कुछ बाहर की
कुछ भीतर की
यहाँ वहाँ की
देख कर-सुनकर
खुद से चुगली करता हूँ
आईने में
निहार निहार कर
आँखों के काले धब्बे
झाइयाँ  और बेजान
रूखी त्वचा
उम्र के अंत पर भी
अनंत उमंगों का
खाली झोला लटकाए
टकटकी लगाए
कहीं कोने में बैठा हुआ
बंद पलकों के पर्दे पर
आते जाते लोगों को देखता हुआ
बस यूं ही
वक़्त के हमकदम होता हूँ 
मन के साथ चलता हूँ ।

~यशवन्त यश©

03 June 2015

कभी कभी ......

ऐसे ही होती है
हर दिन की शुरुआत
कभी कुछ चाहते हैं
योजना बनाते हैं
होता कुछ और है
और  कभी
अपने आप ही
होने लगता है
सब कुछ
अनुकूल 
नकारात्मकता
प्रतिकूलता को
पीछे छोड़ कर
हम बढ्ने लगते हैं आगे
खटकने लगते हैं
कुछ लोगों की आँखों में
फिर भी
जीते जाते हैं
कुछ थोड़े से पल
कभी कभी।


~यशवन्त यश©

02 June 2015

कुछ नहीं ......

एक अकेला
मेरा मन
रोज़ भटका करता है
खुद की खोज में
यह जानते हुए भी
कि देखा करता है
खुद का अक्स
गर्मी से जलती
चमकती
रेतीली देह के
दर्पण में
महसूस करता है
खुद को प्रत्यक्ष
अपने चंचलपन में
यहाँ वहाँ
घूम फिर कर
लौट आता है
आ मिलता है
अपने आरंभ
अपने अंत पर
और उस बिन्दु पर
जिसकी सीमारेखा के भीतर
खालीपन में
कुछ भी खाली नहीं ।

~यशवन्त यश©

01 June 2015

बीतती तारीखें ........

पल दर पल
दिन दर दिन
महीनों और
साल दर साल
बीतती तारीखें
अपने जिस्म पर
जख्म और दर्द लिए
बेबसी और लाचारी के
किस्सों में
कहीं दफन हो जाती हैं
और जब
अचानक से याद आती हैं
तब खाली हाथ लिए खड़ा
अगला पल
झट से निगल जाता है
उन यादों को
जैसे बचना चाहता हो
भयंकर भूख के
तीखे एहसास से। 

~यशवन्त यश©

19 May 2015

थैंक्यू अमेरिका, हिंदी को बचा लिया --सुधीश पचौरी

अब मुझे संतोष है कि हिंदी अगर अपने घर में मर भी गई, तो अमेरिका में जरूर बची रहेगी। देखना, एक दिन हम अमेरिका से करार करेंगे और नकद डॉलर भुगतान करके हिंदी इंपोर्ट किया करेंगे। वह हमें ‘पीएल फोर एट्टी’ की तरह राशन में मिला करेगी और इस तरह हमारी हिंदी,  हतक की सारी कोशिशों के बावजूद जिंदा बची रहेगी। यकीन नहीं है,  तो यह खबर अपनी आंखों से पढ़ लीजिए। एक दैनिक ने दो कॉलम में छापी है कि एक ‘फुलब्राइट’ स्कॉलर (विद्वान) को अमेरिका ने अपने एक विश्वविद्यालय में छात्रों को दो सेमेस्टर हिंदी पढ़ाने के लिए आमंत्रित किया है। वे जल्द ही जाने वाले हैं और अमेरिकी छात्रों को हिंदी पढ़ाने वाले हैं।

वे पढ़ाएंगे। फिर वे हमें सिखाने आएंगे। हम दांतों तले उंगली दबाकर उनका आभार प्रकट करेंगे कि भगवन आपने बचा लिया! जिस तरह जर्मन पुत्र मैक्समूलर ने वेद की महिमा का गान कर वेद बचाए और देवभाषा के प्रति फिरंगियों की जिज्ञासा बढ़ी और उनकी जिज्ञासा देख इधर के लोग जिज्ञासु हुए और इस तरह देवभाषा को जीवनदान मिला, उसी तरह एक दिन हिंदी नामक देशजभाषा भी अमेरिकी मुख-कमलों के जरिए उचरेगी और बचेगी! सच ही कहा है कि मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है। इसीलिए कह रहा हूं कि एक दिन हम अमेरिका के एहसानमंद होंगे। उसे ‘थैंक्यू-थैंक्यू’ कहते न अघाएंगे। ‘फुलब्राइट’ का जादू ही कुछ ऐसा है कि उसे देखकर आंखें चौंधिया जाती हैं। एक तो ‘ब्राइट’, तिस पर एकदम ‘फुल।’

जरा ‘फुलब्राइट’ की हिंदी तो करके देखिए। आप चमत्कृत हो उठेंगे। ‘फुलब्राइट’ यानी पूरी तरह चमका हुआ, यानी समग्रत: तेजस्वी! आप जानते ही हैं कि हर ऐरा-गैरा, नत्थू खैरा फुलब्राइट नहीं हो सकता है। फुलब्राइट अगर हुआ जा सकता है, तो अंग्रेजी में ही हुआ जा सकता है। और अंग्रेजी के ‘वाया’ हिंदी में ‘आया’ जा सकता है। अंग्रेजी के वाया हिंदी में आने वालों की कमी नहीं, लेकिन किसी ने भी फुलब्राइट के तहत हिंदी नहीं पढ़ाई! ऐसे लोगों में अधिकतर ने अंग्रेजी पढ़ हिंदी में लिखा। कई ने तो हिंदी में अंग्रेजी का उल्था ही पेल दिया। कई अंग्रेजी से हिंदी को ‘संपन्न’ करते पाए गए, लेकिन माने ‘अनुवादक’ ही गए। कई लोगों ने आलोचना के अखाड़े खोल डाले।

अंग्रेजी पढ़कर हिंदी में घुसने का कारण यही रहा कि अंग्रेजों ने इनको जरा भी घास न डाली। कारण, इनकी अंग्रेजी ऐसी-वैसी ही रही, सो पिट-पिटाकर ‘हिंदी की सेवा’ करने लग गए, यानी ‘फिसल गए तो हर गंगे!’ हिंदी वाला मिजाज से उदार और बहुलतावादी ठहरा। उसने बिना वीजा-पासपोर्ट के इनकी अवैध एंट्री पर भी कोई ऐतराज नहीं किया। जिस तरह अंधों में काना राजा,  उसी तरह से हिंदी वालों के बीच ये राजा बन गए। फिर हिंदी में अंग्रेजी के एक्सपोर्टर-इंपोर्टर बन गए। इनकी देखा-देखी कई हिंदी वाले भी इंपोर्ट-एक्सपोर्ट के ही काम में लगे रहे। एक ने तो बिना संदर्भ दिए अंग्रेजी में उपलब्ध रूपवादी माल हिंदी में तड़ दिया। और दूसरा अब भी छठे-छमासे अंग्रेजी से हिंदी में कुछ तड़ता रहता है। आज हिंदी वाला न ठीक से हिंदी लिख सकता है, न बोल सकता है। हिंदी मरणासन्न है। इसी कारण अब अमेरिका हिंदी में फुलब्राइट करने वाला है। इसी तरह हिंदी बचेगी और भविष्य में हमारे बच्चे भी फुलब्राइट से हिंदी ट्यूशन लिया करेंगे। आमीन!

-साभार-'हिंदुस्तान'

14 May 2015

खुद से ही बहुत दूर.....

खुद से कहीं दूर
थोड़ा हैरान
थोड़ा परेशान
खुद को पाने के
हर जतन
करता हुआ
रेतीली राहों पर
चलता हुआ 
हर पल
जीने की कोशिश में
साथ लिए 
भीतर थोड़ा दर्द
सामने थोड़ी मुस्कान 
खुद के कुछ नजदीक
खुद को छूने की
कोशिश करता हुआ 
न जाने क्यों
होता जा रहा हूँ
खुद से ही बहुत दूर।

~यशवन्त यश©

09 May 2015

कुछ लोग -16

बहुत सस्ते होते हैं 
कुछ लोग
जो बिताया करते हैं
अंधेरी रातें
फुटपाथों पर
और दिन में
झुलसा करते हैं
घिसटा करते हैं
डामर वाली
चमकदार सड़कों पर
चमका करते हैं
चाँद के चेहरे पर
कील मुहांसों की तरह।

ये सस्ते लोग
खुदा,गॉड और
भगवान नहीं
सिर्फ एक
ऊपर वाले के
हाथों से ढल कर
परीक्षक बन कर
धरती पर
आते हैं 
और फिर
वापस चले जाते हैं
साहब लोगों की
चमचमाती कारों के
काले टायरों की
पैमाइश ले कर।

ये सस्ते लोग
आवारा कटखने
श्वानों का तकिया
सिरहाने रख कर
हर रोज़
चैन की नींद सोते हैं
क्योंकि
इन्हें कोई डर नहीं होता 
चेहरे से
नकाब के हटने का।

~यशवन्त यश©

05 May 2015

कुछ लोग -15

रेत के महलों के भीतर
आसन जमाए
कुछ लोग
सिर्फ देख सकते हैं
काल्पनिक चलचित्र
जिनमें
अच्छा ही अच्छा
सब कुछ
सकारात्मक
सुलझा हुआ
और सिकुड़न मुक्त होता है
लेकिन नहीं जानते
कि यह सब दृश्य
परिणाम हैं
उनके खौफ
या प्रभाव के
जिसका अंत
संभव है
तेज़ हवा के
सिर्फ एक
झोंके से ।

~यशवन्त यश©

01 May 2015

क्योंकि मैं मज़दूर हूँ -(मई दिवस विशेष)

ढोता हूँ
दिन भर
ईंट,पत्थर और गारा 
अपने घर का
और नयी इमारत का सहारा
मैं नहीं वह बेचारा
जो नायक है
काल्पनिक चलचित्रों
कविताओं
और कहानियों का
जो अपने सुखांत
और दुखांत के बीच
मेरे जीवन की
अनकही
अनजानी रेखाओं को
सरे बाज़ार 
नीलाम करने के बाद भी
रखती नहीं
एक धेला
मेरी कर्मठ
काली
मांसल हथेलियों  पर .....

मैं
समय की
अनंत ऊंचाई पर बंधी
महीन रस्सी पर
चल कर
संघर्ष के
सँकरे रस्तों से गुज़र कर 
रोज़ मिलता हूँ
जीवन और मृत्यु से....
अपने  और अपनों के
सुनहरे कल की
चाहत लिये
हजारों की भीड़ में 
कहीं हमकदम
गुमनाम हो कर
खून पसीना पी कर 
ठोकरें खा कर
चुन जाता हूँ
किसी नींव में
किसी दीवार में
फिर भी नज़र नहीं आता हूँ
इतिहास के
किसी गर्द भरे
पन्ने पर
क्योंकि
मैं
मज़दूर!
दूसरों को
उनकी मंज़िल दे कर
बहुत दूर हूँ
खुद की मंज़िल से। 

~यशवन्त यश©
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