बी
ए पास
वह
रिक्शे वाला
मौसम
की हर मार से
बे
असर –बे खबर
हर
समय रहता है तैयार
चलने
को
तलवार
की धार की तरह
पैनी
तीखी
मेरे
शहर की
सड़कों
के साथ जाती
किसी
की मंज़िल तक
पहुँचने
को
या
पहुंचाने
को।
वह
सवारियों
के लिए
उठा
लेता है
‘हुड’
धूप
और
बरसात
से बचने को
लेकिन
खुद
पसीने
से तर-बतर
चेहरे
पर मुस्कान
और
ज़ुबान पर
मीठी
बात लिए
किसी
कुशल
‘सेल्समैन’
की तरह
गड्ढेदार
सड़कों के
प्रतिउत्तर
का
अपने
संयम और
उत्साह
से
सामना
करते हुए
बस
कामना करता है
अपने
‘उचित प्रतिफल’ की।
बी
ए पास
वह
रिक्शे वाला
कल
मुझे मिला
और
इच्छा करने लगा
कहीं
एक
अदद नौकरी की
सिफ़ारिश
की....
मदद
की
बिना
उसका उत्तर दिये
बी
ए पास ‘मैं’
बस
अपने मौन में
यही
सोचता रहा
कि
मुझसे कहीं बेहतर
आत्मनिर्भर
बी
ए पास
वह
रिक्शे वाला
आखिर
क्यों
बनना
चाहता है
मेरी
तरह
सूट-बूट
टाई
और काले चश्मे वाला
एक
(अ)सभ्य
मजदूर।
-यश©
14/07/2017
