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09 August 2010

एक बेरोजगार की व्यथा

बाईस साल का हो गया हूँ
सैकड़ों दफ्तरों के चक्कर लगाते-लगाते
थक गया हूँ
मोटे तले का मेरा जूता
एक महीने में घिस घिस कर
बूढा हो गया
सड़क को भी प्यारा हो गया
अब नया जूता पहन कर
फिर चक्कर लगा रहा हूँ
बाईस साल का हो गया हूँ

क्या करूँ
इस उम्र में
किस्मत वाले I A S
बन जाते हैं
शान दिखाते हैं
और मैं
बाईस साल का हो गया हूँ

माँ बाप पर बोझा बन गया हूँ
वो कहते हैं
बेटा,सिफारिश के बगैर
नौकरी नहीं मिलती
तेरी नहीं है
तू तो बस रोता रहेगा

में सोचता हूँ
शायद ठीक कहते हैं
जब सिफारिश के बगैर
गर्लफ्रैंड नहीं मिल सकती
तो नौकरी कैसे मिल सकती है

अब सिफारिश की सोच में डूब गया हूँ
बाईस साल का हो गया हूँ.

1 comment:

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