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19 January 2014

मैंने कब कहा .......

मैंने कब कहा
आसमान से
तारे तोड़ कर लाऊँगा

मैंने कब कहा मैं ही
चाँद और
मंगल पर जाऊंगा

मैंने कब कहा
अँधेरों में
रोशनी बन जाऊंगा

मैंने कब कहा
सोने पर
हीरे सा जड़ जाऊंगा

मैंने कब कहा
सीढ़ी लगा
गगन से मिल आऊँगा

मैंने कब कहा
सर्दियों में
रोज़ ही नहाऊँगा

मैंने कब कहा
अपना कहा यूं
लिख कर मिटाउंगा

मैंने कब कहा
हर पाठक के
दिमाग का दही बनाऊंगा 

मैंने जो कहा
तब कहा
कहे से मुकर जाऊंगा

मैंने अब कहा
अपने कहे पर
कहकहे लगाऊँगा

मैंने कब कहा
मेरा लिखा
पढ़ना ज़रूरी है

हूटिंग के इस दौर में
'यशवंत'
अब भागना मजबूरी है।

~यशवन्त यश©

12 comments:

  1. Interesting...maine ab kaha

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  2. बहुत बेहतरीन रचना...
    :-)

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  3. जहाँ जाओगे हमे बता देना
    हमे हमेशा जरूरत होगी <3
    हार्दिक शुभकामनायें

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  4. हा हा सही कहा भागना जरूरी है हूटिंग में तो ...

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  5. haha sach me majedaar tarike se stya ko ubhara hai aapne ..nice .. :)

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  6. बहुत सुंदर....!!

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  7. कुछ ना कह कर भी आपने बहुत कुछ कह दिया. बहुत सुन्दर.

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  8. कहे हुए शब्दों का अर्थ हर कोई अपनी समझ के मुताबिक लगाता है..पर छिपी हुई मंशा जाने अनजाने हर दिल भांप जाता है

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  9. हाहा, बढ़िया है!

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