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16 March 2018

मैं देवी हूँ-9 (नवरात्रि विशेष)

इन नौं दिन
तुमने पूजा है
पत्थर की मेरी मूरत को। 
उसमें प्राण-प्रतिष्ठा कर के
तुमने मांगी हैं मन्नतें
दु:ख के जाने और
सुख के आने की।
सप्तशती के
सात सौ श्लोकों के साथ 
तुमने रखे हैं
फलाहार और निर्जल व्रत।

लेकिन कभी सोचा है
क्या होगा इस सबसे ?

क्या बदल पाए हो
खुद की नज़रों और
नजरिए को ?

क्या निकल पाए हो
अपनी पुरातन सोच के
दायरे से ?

नहीं
कुछ बदलाव नहीं होगा
बस भ्रम बना रहेगा
यूं ही चारों ओर
क्योंकि
तुम्हारी हर क्रिया-प्रतिक्रिया का
रहस्य मैं जानती हूँ
मैं! देवी हूँ।

-यश ©
16/03/2018


1 comment:

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