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08 June 2019

अक्षर-अक्षर मिटता जा रहा हूँ

यहीं कहीं
अपने मन को
किसी कोने में रख कर
बे खयाली में
कहीं खो कर
खुद पर लगे
अनगिनत
प्रश्न चिह्नों को
सहेजते हुए
निर्वात में चलते हुए
अस्तित्वहीनता
के साक्षात स्पर्श की
अधूरी चाह के साथ
'मैं' से दूर होता हुआ
मैं
हर बीतते क्षण के साथ
सिमटता जा रहा हूँ
अक्षर-अक्षर
मिटता जा रहा हूँ ।

-यश ©
08/06/2019

1 comment:

  1. अस्तित्त्व में हीनता जैसा कुछ नहीं होता..एक मात्र अस्तित्त्व ही होता है..मैं से दूर जाकर ही मिलता है एक और 'मैं'जिसमें सारा अस्तित्त्व समाहित होता है..

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