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15 December 2010

परछाई

(Photo Curtsy:Google Image Search)


जब कभी बोझिल सा
महसूस करता हूँ खुद को
देखता हूँ ज़मीं पर
पड़ने वाली परछाई को
दो कदम चलता हूँ
कुछ आगे
कुछ पीछे
ये परछाई
मेरे साथ ही रहती है
मैं बातें करता हूँ
अपनी ही परछाई से
जो मन में आता है
कह देता हूँ  
कभी कुछ अच्छा
कभी कुछ बुरा
जीवन की ऊंची नीची
राहों पर
सच्चे दोस्त की तरह
ये परछाई 
मेरे साथ रहती है
हर सुख में
हर दुःख में
 उन अपनों से बेहतर है
जो साथ छोड़ देते हैं
उगल देते हैं
एक दूसरे के दबे छुपे राज़
ये परछाई
सबसे अच्छी
साथी है  
सबके साथ देती है. 
जीवन के अंत तक

14 December 2010

वो

वो जिनके नाम कर रखी हैं
हमने अपनी साँसें
आज रूठ कर चले गए हैं
न जाने कहाँ
आवाज़
यूँ तो हम उनको
बहुत देर से दे रहे हैं
समझ कर बेवफा वो
रो रहे हैं
है मालूम उन्हें भी  कि
असल मोहब्बत तो वही हैं
फिर भी चाहते हैं
इज़हार हम ही करें
बेचैन  दिल है
और शायद दिमाग भी है
शायद हम ही अब अपनी
वफ़ा खो रहे हैं

12 December 2010

वंशिका की कुछ ड्राइंग्स-कृपया अपना आशीर्वाद दीजिये

लखनऊ में रहने वाली नन्ही सी वंशिका माथुर  मेरी चचेरी बहन हैं जो अभी कक्षा-4 में पढ़ती हैं.पढ़ाई के अलावा पेंटिंग इनका शौक है और खेलकूद में इन्हें सिर्फ सांप-सीढी खेलना पसंद है.मेरा तो मन था कि इनकी फोटो भी लगाता लेकिन अभी उपलब्ध नहीं है.
आप भी देखिये इनकी कुछ ड्राइंग्स और अपना आशीर्वाद भी दीजिये.

(हैप्पी क्रिसमस )

(कितनी सुन्दर है ये धरती )

(ये सब भगवान ने बनाया  है )

(इन्द्रधनुष अम्बर में छाया,बच्चों के मन को भाया )

(यूनिकॉर्न)

(तितली बनकर उड़ उड़ जाऊं )

  Children are my weakness!

10 December 2010

डूबता सूरज















 (1)

अक्सर जब देखता हूँ
डूबते हुए सूरज को
सोचता हूँ
काश
ये न डूबता
ये यूँ ही रहता
धरती के इसी तरफ
मेरी नज़रों के सामने
काश कि 
रात का घना अँधेरा न होता
काश कि वक़्त ठहरा होता
मगर नहीं
सूरज को डूबना ही है
कहीं और प्रकाश देना ही है
ये चक्र चलना ही है

(2)

ये डूबता हुआ सूरज
अँधेरे की निशानी
छोड़ देता है
एक मौका देता है
कुछ सोचने का
कुछ समझने का
ये विश्राम नहीं 
चलना ही है
विचारों का घुमड़ना ही है

(3)

ये डूबता सूरज
बादलों की ओट में
लुक छिपकर
एहसास कराता है
कुछ पाने का
कुछ खोने का

(4)

ये डूबता सूरज
बिछुड़ने का दर्द देता है
लोग देखते हैं
और खुश होते हैं
नज़रों से ओझल होते
डूबते सूरज को देख कर
और फिर सलाम करते हैं
अगली सुबह
उगने वाले नए
सूरज को देख कर

न जाने मुझे क्यों ऐसा लगता है
डूबता हुआ सूरज बहुत अच्छा लगता है

08 December 2010

फिर न वापस आऊंगा.

जी लेने दो
दो पल सुकून के
फिर मैं चला जाऊँगा
तुम ताकोगे राह मेरी
फिर न वापिस आऊंगा

मैं भटकुंगा
तंग गलियों में
दुनिया के शोर शराबे में
मैं चीखूंगा
चिल्लाऊंगा
पर कहीं नज़र न आऊंगा

इस कोलाहल से
गुज़र  कर
पूर्व सुनिश्चित सा
ठिठक कर
थाम लूँगा तन्हाई का हाथ
फिर आगे बढ़ता जाऊँगा

बस कुछ ही क्षण
मैं पास  तुम्हारे
दो पल का सुख लेने दो
अंतहीन सफ़र की है शुरुआत
हाथ थाम
मुझे चूम लेने  दो

ताजी हवा के
इस झोंके में
देखो अब मिल जाऊँगा
तुम ताकोगे राह मेरी
फिर न वापस  आऊंगा.

06 December 2010

विविधता में एकता

दिन भर
घर के बाहर की सड़क पर
खूब कोलाहल रहता है
और सांझ ढलते
सड़क के दोनों किनारों पर
लग जाता है मेला
सज जाती हैं दुकानें
चाट के ठेलों की
और कहीं
पटरी पर
पुराने गरम और सूती कपड़ों
की दुकानें
५० रुपये की शर्ट खरीदने को
जुटी हुई भीड़
कहीं कारों से उतरती हुईं
मेम
जो उस पार खड़े ठेले से
खरीद रही हैं
ताज़ी हरी सब्जियां
और उनके साथ वो छोटे बच्चे
अपनी मॉम से 
मचल रहे हैं
बैलून खरीदने  को
और मेरे  बगल में रहने  वाला
नन्हा छोटू
झगड़ रहा है
उस गुब्बारे के लिए
अपने बाबा के साथ 

मैं महसूस करता हूँ
विविधता में एकता को
अँधेरे के गहराने के साथ
सड़क का ये कोलाहल
शांत होने पर
घरों पर 
तेज आवाज़ में चिल्लाते
टीवी के थमने पर  
आखिर सब सो ही तो जाते हैं
कुछ मखमली गद्दों में
और कुछ
आसमां की छत के  नीचे
एक नयी सुबह की आस बांधे

सोना और जगना-
इसमें कोई भेद नहीं है
अमीर गरीब का
जाति औ धर्म का

बस तरीके अलग हैं
सोने और जागने के
कुछ सोते हुए जागते हैं
और कुछ
जागते हुए सोते हैं

आखिर कहीं तो है एकता

विविधता में एकता ! 

04 December 2010

ज़िन्दगी

हंसाती कम, रूलाती ज्यादा है ज़िन्दगी
टूटे कांच के ढेर पर, ठौर सजाती है ज़िन्दगी

ज़िन्दगी हसीं किताब है, जिसके हर हर्फ़ में शिकवे हैं
पल भर में अर्श को,सिफर बना देती  है जिंदगी

क्या कहूँ कि इतना नादाँ भी नहीं हूँ मैं
समझा यही फलसफा कि बेवफा है ज़िन्दगी.





(मैं मुस्कुरा रहा हूँ..)

02 December 2010

फरीदा

फरीदा !
हाँ यही नाम है उसका
मैली सी फ्रॉक पहने
और एक हल्का सा स्वेटर
डाले
वो आती है रोज़ सवेरे
मेरे घर पर
घंटी बजा कर
हम सब को जगाती है
और सारा कूड़ा लेकर
मुस्कुराते हुए
डाल देती है
अपने ठेले पर।

मैं
देखता रह जाता हूँ
कभी उसको
और कभी
सामने की सड़क पर
आते जाते उसके हम उम्र
बच्चों को
जो बन ठन कर
चलते  जाते हैं
विद्या के मंदिर की ओर।

वो भी
एक नज़र डालती है उन पर
चली जाती है
अगले घर पर दस्तक देने।

रोज़ की तरह
हर सुबह सवेरे
छोड़  जाती है
एक प्रश्न चिह्न
समाज के
मस्तक पर।

-यशवन्त माथुर ©




01 December 2010

सिगरेट! अगर तू न होती

(1)
(चित्र साभार:गूगल इमेज सर्च)

सिगरेट! अगर तू न होती
तो बच जाता मैं भी
बगल वाले नेता जी के
मुहं से निकलने वाले
अजीब से
धुंए से
जो मुश्किल कर देता है
जाड़े की गुनगुनी धूप में
दो पल का मेरा बैठना

(२)

सिगरेट! अगर तू न होती
तो कितने ही
कैंसर न पनपते
झोपड़ियों और महलों में
रहने वाले
न रोते,न कलपते

पर तू है!
और तेरा आस्तित्व भी है
कहीं दो कहीं पचास और सौ रुपये में
तू छीन लेती है ईमान
नए किशोरों का
जो भटक जाते हैं
तेरे छलावे में

काश! के कुछ होठों पे
नयी मुस्कान होती
सिगरेट! अगर तू न होती
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