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| (Photo Curtsy:Google Image Search) |
जब कभी बोझिल सा
महसूस करता हूँ खुद को
देखता हूँ ज़मीं पर
पड़ने वाली परछाई को
दो कदम चलता हूँ
कुछ आगे
कुछ पीछे
ये परछाई
मेरे साथ ही रहती है
मैं बातें करता हूँ
अपनी ही परछाई से
जो मन में आता है
कह देता हूँ
कभी कुछ अच्छा
कभी कुछ बुरा
जीवन की ऊंची नीची
राहों पर
सच्चे दोस्त की तरह
ये परछाई
मेरे साथ रहती है
हर सुख में
हर दुःख में
उन अपनों से बेहतर है
जो साथ छोड़ देते हैं
उगल देते हैं
एक दूसरे के दबे छुपे राज़
ये परछाई
सबसे अच्छी
साथी है
सबके साथ देती है.
जीवन के अंत तक








