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08 October 2019

दशहरा मना कर क्या होगा ?

मर न सका जो रावण मन का
पुतले जला कर क्या होगा ?
अज्ञानी थे,अज्ञानी हैं हम
दशहरा मना कर क्या होगा ?

मन के भीतर अंधकार हमारे
मर रहे संस्कार हमारे
केवल कागज़ी सिद्धांतों का
नारा लगाने से क्या होगा ?

एक रंग का लहू है भीतर
तलवार चलाने से क्या होगा?
बन न सके जो इंसान अभी तक
दशहरा मना कर क्या होगा ?

-यश ©
06/10/2019

02 October 2019

रीत युग की बदल रही

श्रद्धा के दो फूल चढ़ाऊँ 
कैसे तुम्हारी समाधि पर? 
रीत युग की बदल रही 
अब खुद की बर्बादी पर। 

सोचता हूँ तुम जहाँ भी होगे 
परिवर्तन को तो देखते होगे 
इन्हीं दिनों के लिए दी कुर्बानी 
तुमने देश की आज़ादी पर ?

नोटों पर छप कर क्या होगा 
आदर्शों की नीलामी पर ?
'हे राम'! ही मालिक अहिंसा के 
सूने चरखे,खादी पर!

-यश ©
01/10/2019 

19 September 2019

उम्मीदें और हम ......

हमारा आज
हमारा कल
हमारा हर पल
चलता है
तो सिर्फ
उन उम्मीदों के साथ
जो
समय का हाथ थाम कर
सिर्फ बढ़ती ही जाती हैं
मृगतृष्णा में
धकेलती ही जाती हैं
और हम
बस उन उम्मीदों के
पूरा होने की चाहत लिए
धँसते ही जाते हैं
फँसते ही जाते हैं
एक अजीब से भंवर में
जहाँ रोशनी नहीं
सिर्फ अंधेरा है
गहरा अंधेरा
दूर-दूर तक
किसी लकीर के
नामो-निशां के बिना
हमें
बस उतरना ही होता है
उठना नहीं,
क्योंकि
हमारा गिरना
द्योतक होता है
उम्मीदों के टूट कर
बिखरते जाने का।

-यश©
19/09/2019  

15 September 2019

कुछ लोग-46

कुछ लोग 
नहीं चाहते बंधना 
नियमों के 
असीम जाल में 
नहीं चाहते 
फंसना 
क्योंकि 
उनका दायरा 
संकुचित होता है 
चारदीवारी के भीतर 
खुद की 
खुशियों तक 
सीमित होता है। 

कुछ लोग 
नहीं चाहते हैं 
टोका जाना 
रोका जाना 
उनको भाता है 
अतिक्रमण....
लांघ कर 
दूसरों की सीमाएँ
चलते जाना।

और जब 
आता है 
ठहराव का 
अंतिम 
अनचाहा पड़ाव 
तब चाह कर भी 
कुछ लोग 
बंध नहीं पाते 
क्योंकि 
अवश्यंभावी होता है 
एक ही 
नीरस चलचित्र का 
बोझिल सा अन्त। 

-यशवन्त माथुर©
15/09/2019
 

08 September 2019

वो बादल भी बरसेंगे........

ये न सोचते कि वही होना है,
जो लिखा के लाए हैं लकीरों पर ।
नयी तकदीरों की झलक दिखती,
गर बदलती तसवीरों पर।
यूं रंग बदले हैं, कई रंग आगे भी बदलेंगे,
अब तक थे जो गरजे, वो बादल भी बरसेंगे।
बस एक इत्तेफाक की उम्मीदों में चराग बुझ जाते हैं
पल गुजरते जाते हैं ,चेहरे बदलते जाते हैं।

-यशवन्त माथुर  ©

06 September 2019

न जाने कौन से एहसानों में........?

वो....
बेसब्री से गिन रहे हैं दिन
मेरी तेरहवीं के इंतजार में
शायद आता है उनको मज़ा
मौत के ही व्यापार में।

हदें अपनी भूल कर
खुद हदों की उम्मीदों में
बेहयाई का ये आलम है
लकीरों के फकीरों में।

है ऐलान यह कि सब अच्छे हैं 
उनके ही गुलिस्तानो में
जाने क्या समझते हैं खुद को
न जाने कौन से एहसानों में?

-यश ©
05092019

01 September 2019

क्या पार कर पाऊँगा?

यूं ही
समय के साथ चलते हुए
कभी-कभी ऐसा लगता है
मानो धारा
छोड़ देना चाहती हो
कहीं -किसी किनारे पर
अकेला
आत्ममंथन के
तिनके चुनने को।

वहाँ
उस किनारे पर
न जाने कितनी सदियों बाद
अनंत की परिक्रमा कर
गर मन चाहा
तो फिर लेने आएगी
खुद में समेटकर
बहा ले जाएगी
वही पुरानी
एक ही धारा। 

लेकिन !
लेकिन तब तक
अपने अंतिम क्षण तक
क्या पार कर पाऊँगा ?
विश्राम की
अग्नि परीक्षा।

-यश ©
01/09/2019

12 August 2019

समय की तसवीरों पर....

पूछता हूँ पता खुद से
खुद को बता नहीं पाता
जमाने की बातों में हरकदम
खुद को ही तलाशता।

क्या पाया क्या नहीं
अक्सर कुछ खोया ही है
बड़े दर्द हैं यहाँ
खुद को ढोया ही है।

न मालूम क्या लिखा है
हाथों की चंद लकीरों पर
जो दिखना है दिखेगा ही
समय की तसवीरों पर।

-यश ©
12/08/2019

04 August 2019

स्वार्थ की जंजीरों में......

कोई दोस्त नहीं होता, दुश्मनों की बस्ती में
जीते हैं कुछ लोग ,बस अपनी ही मस्ती में।

उगते सूरज को सभी, यहाँ सलाम करते हैं
ढलने वाले से , रुखसती का काम करते हैं।

परछाई भी जहाँ, छोड़ देती है साथ निभाना
किसी का सगा नहीं, यह बदलता ज़माना।

मायने अब वो नहीं, जो कभी हुआ करते थे
कायदे अब वो नहीं, बंधे जिनसे रहा करते थे।

दौड़ होती है यहाँ, अक्सर नयी तकदीरों में।
जकड़ गयी है, दोस्ती स्वार्थ की जंजीरों में।

-यश ©
04/08/2019 
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