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18 May 2020

वो कौन था ....

जब कभी मन
शून्य में खुद को देखता है 
अँधेरों में 
खुद को समेटता है 
एकांत के अंत की 
निरंतर प्रतीक्षा में 
समय के साथ 
बीतता है ...
तब 
कहीं दूर से 
अचानक ही 
बातों की पोटली में बंधी 
सैकड़ों 
उम्मीदें लिए 
कोई आ जाता है 
किनारे पर लगा जाता है 
और उड़ जाता है 
छोड़ कर 
भ्रम के कई प्रश्नचिह्न 
कि वो जो था 
कौन था ?

-यशवन्त माथुर ©
18/05/2020

17 May 2020

वक्त के कत्लखाने में -19

सच से बेपरवाह 
सब चलते चले जा रहे हैं 
ख्यालों में उड़ते जा रहे हैं 
अपनी नींदों से उठकर 
कहीं भागते जा रहे हैं 
लेकिन यह एहसास नहीं है 
कि कहाँ जा रहे हैं।  

मजबूरियों के रास्तों पर 
फासले बढ़ते जा रहे हैं 
और हम में से कुछ हैं 
कि बस हँसते जा रहे हैं 
बेरहमी से अपने ही जाल में 
सब फँसते जा रहे हैं । 

ये वक्त का कत्लखाना है 
जान लो! 
यहाँ कुछ बीता नहीं होता 
दीवारों पर उकेरा हुआ 
कुछ मिटा हुआ नहीं होता 
यहाँ याद रखा जाता है 
हर उस पल का हिसाब 
जिस पल से सब सांसें 
लेते जा रहे हैं। 

-यशवन्त माथुर ©
17/05/2020

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16 May 2020

यही नियति है

अपने देश में ही कुछ लोग 
बेगाने हो चले हैं 
अपनी मंजिल की ओर 
वो यूंही निकल पड़े हैं। 

किस बात का करें इंतजार 
भूखे-प्यासे रह कर 
दु:ख का किससे करें इजहार 
झुलसाती गर्मी सह कर। 

सूटकेसों पे घिसट कर 
बच्चे हो रहे हैं बेहाल 
और जो श्रवण कुमार हैं 
उनकी लड़खड़ा रही है चाल। 

दूर है मंजिल क्या करें वो 
बीच राह में रो पड़े हैं 
उनके जीवन का मोल नहीं 
जो थक कर कहीं पर सो पड़े हैं। 

-यशवन्त माथुर ©
16/05/2020

15 May 2020

यह एक चेतावनी है

महामारी के तूफान से भरा 
यह कैसा वर्तमान 
जो अपने भूत और भविष्य को 
धूल के गुबारों में लेकर 
बढ़ता चला जा रहा है 
इतिहास बनता जा रहा है। 

क्या कभी सोचा था 
कि शांत धारा के भीतर मचा भूचाल 
इस तरह से अपने रंग दिखाएगा 
जो कुछ था गतिमान 
सब ठहर जाएगा 
थम जाएगा। 

यह सच है 
और सच यह भी है 
कि विश्व विजेता इंसान 
प्रकृति से हारा ही है 
मैदान छोड़ कर 
सदा भागा ही है। 

यह तूफान चेता रहा है 
कि सुधर जाओ 
अपनी हदों में सिमट जाओ 
वरना नई प्रजाति का भविष्य 
अपनी किताबों में पढ़ेगा 
लुप्त हो चुके मानव की 
विनाश गाथा। 

-यशवन्त माथुर ©
15/05/2020

14 May 2020

नहीं आना चाहता बाहर ......

नहीं आना चाहता बाहर 
इस आभासी दुनिया से 
नहीं होना चाहता अलग 
यहाँ न धोखा है 
न छल, न छद्म 
जो है 
खुला है 
सबके सामने है 
चाहे सफ़ेदपोशों का 
काला सच हो 
या किसी ईमान की कहानी 
शब्दों की जुबानी 
सब होता रहता है व्यक्त 
दिल से बाहर आकर 
दमित भावनाएं 
लेते हुए आकार 
त्वरित और तीक्ष्ण प्रतिक्रिया का 
हर वार झेलते हुए 
अपनी कुंठा को 
धकेलते हुए 
बढ़ जाती हैं आगे 
और हमेशा के लिए 
कहीं थम जाती हैं।  
बस रह जाती हैं 
कुछ अनसुनी 
ठहरी हुई कहानियाँ 
जिनमें रचा-बसा 
वास्तविक दुनिया के चरित्र का 
चीरहरण 
अक्षर-अक्षर उघाड़ता दिखता है 
संवेदनहीनता का हर चरण । 
इसलिए 
अपनी मूर्च्छा से 
नहीं होना चाहता हूँ अलग 
क्योंकि जानता  हूँ 
आभासी दुनिया के पार भी 
मेरी नियति 
चिरनिद्रा ही है। 

-यशवन्त माथुर ©
14/05/2020

13 May 2020

काले-काले फालसे


बचपन में कभी 8-10 रुपये प्रति किलो मिलने वाली यह चीज अब 200-300 रुपये प्रति किलो के भाव मिलती है। एक समय था जब मई -जून के महीने में न जाने कितनी ही बार कभी पापा तो कभी बाबा जी खरबूजा और तरबूज के साथ ही यह भी खरीदा करते थे। फालसे का शर्बत स्वादिष्ट होने के साथ ही स्वास्थ्यवर्धक भी होता है, लेकिन मैं ऐसे ही खाना ज्यादा पसंद करता हूँ। पापा बताते हैं कि आम तौर पर कोई फल खाने के बाद पानी नहीं पीना चाहिए लेकिन अपवाद स्वरूप खरबूजा, बेल और फालसा ये तीन ऐसे फल हैं जिन्हें खाने के बाद पानी पिया जा सकता है।
.
एक बात और शहरीकरण का असर फालसे की खेती पर भी पड़ा है। आज फेरी वाला बता रहा था कि पेड़ कम होने के साथ ही लोगों की घटती पसंद भी इसकी बढ़ती कीमत का कारण है। लोग 20-25 रु की एक सिगरेट तो खरीद सकते हैं लेकिन इतनी ही कीमत में 100 ग्राम फालसा खरीदना उन्हें अपनी तौहीन लगता है।

-यशवन्त माथुर ©
13/05/2020

11 May 2020

चाहता हूँ


चाहता हूँ
शाम का यह सूरज
गंगा की तरह
किसी पवित्र नदी में
डुबकी लगा कर
अपने कर्मों का
करले प्रायश्चित
और अगली सुबह
भोर की शुद्ध किरणों का
आचमन कर
हम सब भी
सामाजिक दूरियों से
निकल कर बाहर
हो उठें बेपरवाह
पहले की तरह।

-चित्र (श्रावस्ती भ्रमण 2019) एवं शब्द यशवन्त माथुर©

जलते हुए ख्याल

मन के भीतर 
जलते हुए ख्याल 
धुआँ बनकर 
उड़ते हुए 
छोड़ जाते हैं 
अवशेष 
जिनमें छुपे हुए 
हजारों प्रश्नचिह्न 
दे रहे होते हैं गवाही 
मिटा दिए गए शब्दों के 
अस्तित्व की। 
इन प्रश्नचिह्नों के 
आखिरी छोर पर 
बची हुई 
एक तरफा प्रेम 
और एकांत की गीली राख 
चाह कर भी सूख नहीं पाती 
मिल नहीं पाती 
अपने मूल में 
क्योंकि अभी बाकी हैं 
उसके कड़वे यथार्थ 
और वर्तमान के 
कुछ पल। 

-यशवन्त माथुर ©
11/05/2020

09 May 2020

मोल-भाव न करो ....

मोल-भाव न करो फेरी वालों से 
वो भी इंसान होते हैं।  
अपने ठेले पर हमारी जरूरत का 
हर सामान ढोते हैं। 

चलते हैं पैदल और पार करते हैं 
हर लंबा रास्ता।  
कुछ ले लो बाबू जी! गुजर करना है 
खुदा का वास्ता ।

जूझ कर गालियों से गलियों में 
हफ्ता चुकाते हुए।  
समय उनको भी काटना है 
खर्चा चलाते हुए। 

पाँच-दस रुपये कम में कौन से 
काम आसान होते हैं ?
मोल भाव न करो फेरी वालों से 
वो भी इंसान होते हैं।  

-यशवन्त माथुर ©
09/05/2020
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