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18 June 2011

स्वीकारोक्ति

मैं नहीं कवि
न ही कविता
जो मैं लिखता हूँ
बस अपने मन की
कुछ कुछ
कहता चलता हूँ

न कोई आदि
न कोई अंत
न मात्रा ,
न हलन्त
न  समझा व्याकरण
न कभी समझ सकता हूँ
बस यूँ ही
कुछ शब्द
उकेरता रहता हूँ

मुझे कुछ नहीं पता
पर जो देखता हूँ
कुछ सोचता हूँ
और कुछ महसूस करता हूँ

कुछ कुछ
कहने की कोशिश
अक्सर 
करता रहता हूँ
मैं नहीं कवि
न ही कविता
जो मैं कहता हूँ.


22 comments:

  1. बहुत सुन्दर, सहज भावाभिव्यक्ति ...

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  2. बहुत सुंदर शब्द उकेरते हो....... सुंदर रचना

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  3. बहुत बढ़िया ..सहज अभिव्यक्ति मन के भावों की ...!!

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  4. न कोई आदि
    न कोई अंत
    न मात्रा ,
    न हलन्त
    न समझा व्याकरण
    न कभी समझ सकता हूँ
    बस यूँ ही
    कुछ शब्द
    उकेरता रहता हूँ...
    बहुत सुन्दर शब्दो से आप् ने अपने भाव सजाए हैं

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  5. आपकी पुरानी नयी यादें यहाँ भी हैं .......कल ज़रा गौर फरमाइए
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.com/

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  6. बहुत सुन्दर...मन के भावों को व्यक्त करना ही तो सच्ची कविता है..

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  7. कुछ कुछ
    कहने की कोशिश
    अक्सर
    करता रहता हूँ
    मैं नहीं कवि
    न ही कविता
    जो मैं कहता हूँ.
    ye sweekarokti hi to sundar abhivyakti hai aur kavi hriday kee soochak.

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  8. मैं नहीं कवि
    न ही कविता
    जो मैं लिखता हूँ
    बस अपने मन की
    कुछ कुछ
    कहता चलता हूँ... bhut bhut acchi abhivakti... sayad main bhi kuch aisa hi likhna chahti thi... par shabd nhi mile... apne bhut khubsurti se shabdo se khud vaykt kiya h...

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  9. bahut achchee bhaav abhivyakti hai.


    ''बस अपने मन की
    कुछ कुछ
    कहता चलता हूँ..''
    yahi to hai kavita aur aise hi bante hain kavi..

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  10. मैं नहीं कवि
    न ही कविता
    जो मैं लिखता हूँ
    बस अपने मन की
    कुछ कुछ
    कहता चलता हूँ,

    वाह, बहुत सुंदर, विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  11. शायद इसी कहने बुनने में कविता रची जाती है ... बहुत सुंदर ....

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  12. सही अर्थों में, कविता जहाँ उद्गम पाती है, उस बिन्दु पर खड़ी है यह उक्ति| बधाई इस सीधी और सपाट स्वीकारोक्ति के लिए|

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  13. प्रिय यशवन्त,

    शायद जो मन में आता है उसे हम कह पायें यही सबसे बड़ी नियामत होनी चाहिये....वर्ना अक्सर हम जिन्दगी में अपने आस-पास देखते हैं कि लोग चाहते हुए भी वह सब नही कह पाते हैं जो चाहते हैं और संत्रास में डूब जाते हैं।

    जीवन की उधेड़-बुन में निखर आयी कविता अपने संप्रेषण के अंदाज से प्रभावित करती है।

    मुकेश कुमार तिवारी

    नोट: शायद किसी तकनीकि समस्या की वज़ह से मेरी अपनी गूगल प्रोफाईल को यह टिप्पणी अपॉलॅट नहि ले पा रहा है।

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  14. न कोई आदि
    न कोई अंत
    न मात्रा ,
    न हलन्त
    न समझा व्याकरण
    न कभी समझ सकता हूँ
    बस यूँ ही
    कुछ शब्द
    उकेरता रहता हूँ
    bahut achchi prastuti.badhaai sweekaren.

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  15. bas aise hi likhte raho...

    sahitya ban jaayega..

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  16. कमाल के भाव लिए है रचना की पंक्तियाँ .......

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  17. न कोई आदि
    न कोई अंत
    न मात्रा ,
    न हलन्त
    न समझा व्याकरण
    न कभी समझ सकता हूँ
    बस यूँ ही
    कुछ शब्द
    उकेरता रहता हूँ

    यही तो मन की सच्ची भावनाएं हैं...

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  18. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

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  19. कवि तो आप बन ही गए हैं, कुछ कहें या न कहें, कवि होना तो एक भाव दशा का नाम है... सुंदर रचना !

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  20. बहुत सुंदर प्रस्तुति.......कितनी ही सारी बातें कह डाली कुछ ही पंक्तियों में
    मैं न ही कवि,
    ना ही कविता....

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  21. bahut sundar.....pahli baar aapke blog par aai hun..bahut achha lga..

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