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06 June 2011

क्यों आये हो........

जिंदगी की शामों में
तुम दिया जलाने क्यों आये हो
मैं अंधेरों में जीया करता था
तुम राह दिखाने क्यों आये हो?

ये कैसा पागलपन
क्यों मेरी सोयी उमंगें जिलाओगे
जब फैलाऊंगा मैं बाहें
रूठ कर चले जाओगे

यूँ तडपने दो तुम  मुझ को
क्यों सेज सजाने आये हो
जिंदगी की शामों में क्यों
क्यों दिया जलाने आये हो?

{नोट-मुझे ऐसा लगता है इससे मिलती जुलती पंक्तियों को पहले कहीं पढ़ा है लेकिन याद नहीं कहाँ? यदि आपको कोई ऐसी समानता नज़र आये तो कृपया  इस रचना को उससे प्रेरित समझें}

13 comments:

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  1. जिंदगी की शामों में
    तुम दिया जलाने क्यों आये हो
    मैं अंधेरों में जीया करता था
    तुम राह दिखाने क्यों आये हो?
    bahut badhiyaa

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  2. ये कैसा पागलपन
    क्यों मेरी सोयी उमंगें जिलाओगे
    जब फैलाऊंगा मैं बाहें
    रूठ कर चले जाओगे
    बहुत sundar bhavabhivyakti . badhai .

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  3. ये कैसा पागलपन
    क्यों मेरी सोयी उमंगें जिलाओगे
    जब फैलाऊंगा मैं बाहें
    रूठ कर चले जाओगे

    बेहद उम्दा भावाव्यक्ति।

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  4. बहुत सुंदर भावों से भरी छोटी सी कविता !

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  5. आज तो टिप्पणी मे यही कहूँगा कि बहुत उम्दा रचना है यह!

    एक मिसरा यह भी देख लें!

    दर्देदिल ग़ज़ल के मिसरों में उभर आया है
    खुश्क आँखों में समन्दर सा उतर आया है

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  6. ये कैसा पागलपन
    क्यों मेरी सोयी उमंगें जिलाओगे
    जब फैलाऊंगा मैं बाहें
    रूठ कर चले जाओगे...मन को छू गई….

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  7. जिंदगी की शामों में
    तुम दिया जलाने क्यों आये हो
    मैं अंधेरों में जीया करता था
    तुम राह दिखाने क्यों आये हो?

    बहुत बढ़िया....

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  8. अभिव्यक्ति और सघन होती जा रही है .....शुभकामनायें !

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  9. जिंदगी की शामों में
    तुम दिया जलाने क्यों आये हो
    मैं अंधेरों में जीया करता था
    तुम राह दिखाने क्यों आये हो?

    उत्कृष्ट अभिव्यक्ति...

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  10. शिकायत बहुत खूबसूरती से लिखी है आपने ......
    हमारी यही दुआ है की आप हमेशा ऐसे ही अहसास उकेरते रहें ...

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  11. poignant and creatively expressed !!

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