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07 January 2013

खानाबदोश कौन ?

खानाबदोश कौन ?
वो जो
आवारा जानवरों की तरह
सड़क किनारे भटकते हैं
दो जून की रोटी को  !
या
खानाबदोश मैं ?
जो हर पल भटक रहा हूँ
दर बदर  
अस्तित्व की तलाश में!
©यशवन्त माथुर©

06 January 2013

अजीब सी धुन .....

मन को लुभाने वाली
संगीत की धुन 
उस वक़्त अजीब सी लगती है 
जब कानों में गूंजने वाली 
मीठी स्वरलहरियाँ 
राह से भटक कर
धर लेती है रूप 
फटे बांस की आवाज़ जैसा :) 
 ©यशवन्त माथुर©

05 January 2013

कुछ प्रश्न

कुछ प्रश्न
हमेशा
सिर्फ प्रश्न ही रहते हैं 
क्योंकि
उनके उत्तरों में लगा
प्रश्न चिह्न
कभी मिटने नहीं देता
अपना अबूझ
अस्तित्व!

©यशवन्त माथुर©

04 January 2013

सफर की दास्तान....

बड़े अजीब से
इन रास्तों पर चल कर
कभी गिर कर
कभी संभल कर
ज़रूरी नहीं कि कोई
इनसां ही
बने हमसफर ...
किनारे गिरे पड़े
टेढ़े मेढ़े पत्थर
पैरों की
खाते हुए ठोकर
सुना सुना कर
खटर पटर
संगीत की तान....
कर देते हैं पूरी
इस सफर की दास्तान।
©यशवन्त माथुर©

03 January 2013

क्षणिका .....

सवेरा कब का हो गया
फिर भी
कोहरे के आँचल तले
अब तक
धूप सो रही है
ले रही है 
मंद हवा के खर्राटे
बता रही है
पेड़ों की हिलती पत्तियों को 
कि आलसी
सिर्फ
इंसान ही नहीं होता। 

 ©यशवन्त माथुर©

02 January 2013

क्षणिका.....

सोच रहा हूँ
ख्वाबों के दल दल से
बाहर आ कर
काल्पनिक दुनिया के
पार आ कर
चुभीली सच्चाई से
हाथ मिला कर
अब कर ही लूँ दोस्ती
वक़्त की
उठती गिरती
लहरों से ।

©यशवन्त माथुर©

01 January 2013

कैसे करूँ स्वागत ?

भोर की पहली किरण
कहीं धुंध
और कहीं खिली धूप
कहीं चिड़ियों का चहचहाना
अपनी ही मस्ती मे
चलते जाना
गाते जाना
स्वागत गीत
कितने सारे
बिंबों के साथ
कितने सारे
चित्रों के साथ
कुछ वास्तविक
कुछ काल्पनिक
कुछ कविता
कुछ कहानी
और कुछ
उड़ते
बिखरते शब्दों का साथ
कर रहा है स्वागत
नव वर्ष का  !

पर
सुखांत के इन बिंबों मे
इन चित्रों मे
कविता मे
कहानी मे 
डाल पर बैठी
उस चिड़िया के गीतों मे
एक रूप
एक स्वर
एक मुस्कुराहट
एक खुशी
अगर 'उसकी'
भी होती ......
एक गीत
अगर
उसके भी मन का होता....
उसके अपनों का  होता....
तो कैसा होता ?
कितना अच्छा होता
नव वर्ष-
तुम्हारा स्वागत
आज के दिन !

अफसोस !
तुम आए हो
उस वक़्त 
जब
लाखों प्रार्थनाओं
की हार पर 
लाखों दुआओं
की हार पर
बे सिर पैर की
रार के बीच
छाया हुआ है
कुछ छद्म
और 
कुछ वास्तविक 
मौन
एक कोने से
दूसरे कोने तक
पत्थरों के भी
रूदन के बीच
नव वर्ष !
अब तुम्ही बता दो
कैसे करूँ
स्वागत ?

©यशवन्त माथुर©

28 December 2012

कैसी सर्दी आई है ?


धुंध कोहरे की जमी दिन भर
धूप छुपी शरमायी है
मफ़लर, टोपी, शॉल और स्वेटर
निकला कंबल, रज़ाई है

देखो सर्दी आई है  ....

हीटर, गीजर दौढ़ता मीटर
सुस्ती मे अब चलता फ्रीजर
हाट मे सस्ती मिलती गाज़र
हलवे की रुत आई है

देखो सर्दी आई है   .....

मूँगफली के दाने टूटते
रेवड़ी- गज़क के पैकेट खुलते
चाय -कॉफी की चुस्की लेते
गुड़ देख चीनी लजाई है

देखो सर्दी आई है   ......

सिर से पैर तक खुद को ढ़क कर
मौसम के अमृत को चख कर 
बाहर जब नज़र घुमाई है

नंगे जिस्मों पर ओस की बूंदें
मुझे कभी समझ न आई है

कैसी सर्दी आई है ?

©यशवन्त माथुर©

25 December 2012

अगर कुछ दे सको तो ........

सेंटा !
सुना है
तुम बिना मांगे
अपनी झोली से निकाल कर
खुशियाँ बांटते हो 
मुस्कुराहटें बांटते हो
और निकल लेते हो
अपनी राह
बिना कुछ कहे
बिना कुछ सुने

पर
आज
मैं मांगुंगा
और तुम्हें देना होगा
सिर्फ मुस्कुराओगे नहीं
तुम्हें बोलना भी होगा

तो सुनो
इस क्रिसमस पर
पुरुष के मन को
लज्जा ,शील, सौंदर्य
और कोमलता से भर कर
स्त्री के मन को
दृढ़ता
और बाहुबल से भर कर
दोनों की आँखों को 
सहानुभूति की नज़र
देकर 
घुमा दो अपनी
जादू की छड़ी
और बदल दो
भोग पर आश्रित
इंसानी सोच को

सुना तो ये भी है
कि बच्चों पर
जान छिड़कते हो तुम
तो
कुछ ऐसा भी कर दो
कि नन्हें अधरों की
भोली मुस्कुराहट
बनी रहे हमेशा

सेंटा!
अगर कुछ दे सको तो
पूरी कर देना
बस इतनी सी चाह
इस क्रिसमस पर !

©यशवन्त माथुर©
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