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06 March 2015

क्योंकि रंग इंसान नहीं होते

हर ओर
उड़ते
बिखरते
बहकते
चहकते
महकते
गीले
और
सूखे रंग
रंगभेद
जात धर्म  
अमीर और
गरीब से परे
सबके चेहरों पर
सजे हुए हैं 
एक भाव से 
विविधता में
एकता का
भाव लिए 
क्योंकि रंग
इन्सानों की तरह
भेदभाव नहीं करते।

~यशवन्त यश©


होली की हार्दिक शुभ कामनाएँ ! 

05 March 2015

ख्याल और फूल

दिन में
खिले खिले ख्याल
शाम होते ही
मुरझा जाते हैं
परागविहीन 
किसी फूल की तरह
थक कर चूर हो कर
या तो
अलग कर लेते हैं खुद को 
मन की डाली से
या
उतरा सा चेहरा लिए
नये जीवन की आशा में
तोड़ देते हैं दम....
और फिर
मौका पाकर
ख्यालों की नयी कलियाँ
ख्वाबों से बाहर आकर
हर नयी सुबह
एक नया फूल बन कर
बिखरा देती हैं
नयी सी खुशबू
जीवन वृत्त की
सभी दिशाओं में। 
  
~यशवन्त यश©

04 March 2015

साहित्य दो सौ रुपये किलो-सुधीश पचौरी

हे मेरे प्रिय,  सुहृद, सरस्वती मां के वरद पुत्रो! हे साहित्य के मंदिर के जन्मजात पुजारियो! हे कविता का नाम सुनते ही रोमांचित हो खंजड़ी बजाने वाले खंजड़ियो और मिरदंगियो! हे तुच्छता से आपूर्ण इस युग के कवि कोविदो! हे साहित्यानुराग के मारे साहित्य रोगियो! हे पुस्तक से पुस्तक के लिए पुस्तक द्वारा आध्यात्मिक प्रीति रखने वाले प्रीतमो! इन उपाधियों से आप तनिक भी चकित न हों और इस नीच परम पामर से जरा-सा भी नाराज न हों, क्योंकि साहित्य की यह बोली उसकी लगाई नहीं है। न यह किसी साहित्यद्रोही का षड्यंत्र है, न यह सीआईए की साजिश है, न नई सरकार की कोई नई बदमाशी है, और न संघ की साहित्य के प्रति बदसलूकी है, बल्कि यह अंग्रेजी के एक सेक्युलर और स्वतंत्र अखबार में छपी खबर भर है, जो साहित्य को जनता की जेब तक सीधे पहुंचा रही है और साहित्य को सबके लिए उपलब्ध करा रही है।

हे साथी, ऐसा क्यों हो रहा है? इसका समाजशास्त्रीय व अर्थशास्त्रीय कारण क्या है? क्या यह मंदी का असर है या बजट का? हे कॉमरेड! जिस तरह सोवियत संघ के पतन के बाद सोवियत साहित्य बीस रुपये किलो के भाव तौल में मिला करता था, उसी तरह साहित्य अब तौल के भाव मिल रहा है। बतर्ज ‘मैंने लियो तराजू तोल।’ साहित्य को दो सौ रुपये किलो के भाव से बिकता देख मुझे इस उत्तर-समाजवादी समय में भी समाजवादी किस्म का दौरा पड़ गया। सोवियत संघ जो पुण्य कार्य जीते जी नहीं कर पाया, जिसे चे ग्वेरा के सौजन्य वाला फिदेल कास्त्रो निर्मित समाजवाद भी नहीं कर पाया, वियतनामी समाजवाद भी नहीं कर सका, न नेहरू का ‘अवार्डी समाजवाद’ कर पाया, चीनी समाजवाद नहीं कर पाया, उसे दरियागंज के एक मामूली किताब बेचने वाले ने कर दिखाया।

किताब पढ़ने वाले को तौलकर खरीदने की समझ दरियांगज के पटरी विक्रेता से मिल रही है। यों तो किताबों की दुनिया में पहले भी ‘सस्ता साहित्य’ टाइप के ‘भंडार’ बने, कहीं ‘मंडल’ बने, लेकिन तौलकर तो उन तक ने भी न बेचा। ऐसा क्यों हो रहा है? क्या साहित्य सचमुच सस्ता हो गया है? क्या उसकी नई सेल लगी है? क्या साहित्य पर अमेरिकी मंदी की मार अब जाकर पड़ी है? कहीं ऐसा तो नहीं कि रुपये के कमजोर होने के कारण ऐसा हो रहा हो? कहीं ऐसा तो नहीं कि यह साहित्य का चीनी फैक्टरी उत्पादित फैक्टर है? जिस तरह चीनी समाजवाद ने दिवाली-होली पर हिंदू देवी-देवताओं की प्लास्टिक की मूर्तियां बना-बनाकर हिन्दुस्तानी मार्केट को पाट दिया है और अब ये कुंतल के हिसाब से मिलते हैं, कहीं उसी तरह का व्यवहार चीनी इंडस्ट्री साहित्य के साथ तो नहीं कर रही? शायद नहीं।

साहित्य के थोक के भाव मिलने का कारण अपनी ‘लोकार्पण इंडस्ट्री’ है। अभी-अभी तीन साहित्यिक पत्रिकाएं पढ़ी हैं, जिनके पिछवाड़े के पृष्ठों पर कुल 30 लोकार्पण हुए शोभित पड़े हैं। साहित्यमय भारत के चार हजार कस्बों व नगरों में हर महीने अगर 10-15 लोकार्पण भी होते हों, तो बताइए कि कुल कितने ‘टन’ साहित्य पैदा होता होगा? शायद इसीलिए दरियागंज का विक्रेता ‘लोकार्पित आइटमों’ को दस रुपये किलो के भाव खरीदकर दौ सौ रुपये किलो बेचता है। लोकार्पकों ने तो साहित्य का भाव गिराने में कोई कसर छोड़ी नहीं है, जबकि दरियागंज वाला विक्रेता दो सौ रुपये की दर लगाकर साहित्य का भाव बढ़ा ही रहा है। उसका कुछ तो एहसानमंद होना चाहिए।

साभार -'रविवासरीय हिंदुस्तान'

03 March 2015

किश्त दर किश्त ......

किश्त दर किश्त
बीतते पल
होते जा रहे हैं दर्ज़
इतिहास की
उस किताब पर
जिसके पन्ने
थोड़े स्याह
थोड़े सफ़ेद
और कुछ
आड़ी तिरछी
लकीरों को साथ लिये
बनते जा रहे हैं
दस्तावेज़
कल के लिये
कल की
बीती दस्तानों के। 
ये दास्तानें
जो किस्से बन कर
अक्सर
सुनाई दे जाती हैं
दूसरों की ज़ुबानों से
गली के किसी नुक्कड़ पर
नये नये रूप धर कर
सामने आती हैं
और आगे बढ़ जाती हैं
नयी राहों के सफर पर 
किश्त दर किश्त
बीतते पलों के साथ
किश्त दर किश्त
ढलती उम्र
अब उस दौर मे है
जब अंधेरे को सिरहाने लगाए
अधखुली बेचैन आँखों से
मैं तलाश रहा हूँ
किश्त दर किश्त
मंद होती
रोशनी की परतों को।

~यशवन्त यश©

02 March 2015

कुछ लोग-10

भीतर ही भीतर
अनकहे गम को
साथ लिये
चेहरे पर
मुस्कुराहट का
मुखौटा ओढ़े 
कुछ लोग
चखते हुए
जीवन के
कढ़वे -तीखे स्वाद
हर दिन 
बाँटते चलते हैं
मिठास भरे शब्द
और हर रात के
गहरे काले अँधेरों  में
अपनी चादर के भीतर
करवटें बदलते हुए
पोंछते रहते हैं
गीली आँखों को।

गैर
लेकिन अपने से 
ऐसे कुछ लोग
हो सकते हैं
संख्या में कम
या अधिक
मिल सकते हैं
अपने ही कहीं आस पास
कुछ न होते हुए भी
लगते हैं कुछ खास
फिर भी
बस गुमनाम रह कर
अनेकों दिलों में
लिखवा देते हैं
अपना नाम
कुछ लोग
जिनका पता भी
कुछ लोगों को ही
पता होता है। 

~यशवन्त यश©

01 March 2015

शब्दों के परिंदे ......


मन के आसमान में
बेखौफ उड़ान भरते
शब्दों के परिंदे 
जाने कहाँ कहाँ 
उठते बैठते 
जाने क्या क्या 
कहते सुनते 
क्या क्या कर गुजरते हैं 
खुद भी नहीं जानते। 

मावस की रात में 
चमकते चाँद से बातें कर 
पूनम के अंधेरे में 
यूं ही उदास हो कर  
पतझड़ के फूलों की 
खुशबू में बहक कर  
अनलिखी किताब के 
कोरे पन्नों से लिपट कर ....

शब्दों के परिंदे 
कभी होते हैं 
तिरस्कृत ,पुरस्कृत 
और कभी बन जाते हैं 
उपहास का कारण 
फिर भी ढलते रहकर 
कविता,कहानी 
नाटक और गीतों में 
जीवन के खेलों में 
हार में और जीतों में 
क्या क्या कर गुजरते हैं 
खुद भी नहीं जानते।
 
~यशवन्त यश©
photo with thanks from- 

19 February 2015

नहीं कहना कुछ भी किसी से

यूं तो हैं यहाँ
बहुत से किस्से
सुनने सुनाने को बहुत से
सुनूँ क्या
और क्या कहूँ किससे ....?

नहीं दिखता यहाँ
कोई अपना सा
कुछ समझता सा
राह दिखाता सा
बस 
खुद की परछाई से
अक्सर बातें करता सा....

मन की आज़ादी को
बांटते हुए खुद से
मुझे नहीं कहना
कुछ भी किसी से।

~यशवन्त यश©

11 February 2015

कहना नहीं आता लिखना नहीं आता .......

कहना नहीं आता
लिखना नहीं आता
शब्दों से कभी
खेलना नहीं आता।

ये जो कुछ भी है बिखरा
और रचा बसा यहाँ पर
किस दिमाग की उपज
समझ नहीं आता।

बस देखता हूँ नज़ारे
कुछ यहाँ के कुछ वहाँ के
पेड़ों के हिलते पत्ते
और इशारे हवा के ।

झोंकों से झूमते मन को
कभी नाचना नहीं आता
गुनगुनाता है गीत
कभी गाना नहीं आता। 

सजा देता है दर्द
खुशी और गम के आंसुओं को
पिघलते मोम को कभी
जलना नहीं आता। 

कहना नहीं आता
लिखना नहीं आता
इन शब्दों को कविता
बनना नहीं आता। 

~यशवन्त यश©

01 February 2015

वक़्त के कत्लखाने में -8

बाहर चल रहे
तेज़ तूफान के असर से
वक़्त के कत्लखाने के भीतर
होने लगती है
हलचल 
हिलने लगते हैं पर्दे
दरवाज़े और खिड़कियाँ
अंतिम पल
गिनने लगती हैं
भीतर की रोशनियां  ..
हवा के तीखे झोंके
झकझोर देते हैं
कई पैबंद लगी
खंडहर सी इमारत की नींव
जिसमें रहने वाले
इंसानी शक्लो सूरत वाले
नवजात और
उम्रदराज जीव
कंपकपाने  लगते हैं
अनहोनी की आहट से
और तभी
उम्मीदों के कुछ बादल
कहीं से आ जाते हैं
छा जाते हैं 
और बरस जाते हैं
आँखों से आंसुओं की तरह
दे जाते हैं नमी
प्यास से व्याकुल
हिलती डुलती धरती को
और फिर
हल्की मुस्कुराहट के साथ 
लौट आते हैं
वही पुराने
सुकून के पल
वक़्त के
इसी कत्लखाने में। 
 
~यशवन्त यश©


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