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03 March 2015

किश्त दर किश्त ......

किश्त दर किश्त
बीतते पल
होते जा रहे हैं दर्ज़
इतिहास की
उस किताब पर
जिसके पन्ने
थोड़े स्याह
थोड़े सफ़ेद
और कुछ
आड़ी तिरछी
लकीरों को साथ लिये
बनते जा रहे हैं
दस्तावेज़
कल के लिये
कल की
बीती दस्तानों के। 
ये दास्तानें
जो किस्से बन कर
अक्सर
सुनाई दे जाती हैं
दूसरों की ज़ुबानों से
गली के किसी नुक्कड़ पर
नये नये रूप धर कर
सामने आती हैं
और आगे बढ़ जाती हैं
नयी राहों के सफर पर 
किश्त दर किश्त
बीतते पलों के साथ
किश्त दर किश्त
ढलती उम्र
अब उस दौर मे है
जब अंधेरे को सिरहाने लगाए
अधखुली बेचैन आँखों से
मैं तलाश रहा हूँ
किश्त दर किश्त
मंद होती
रोशनी की परतों को।

~यशवन्त यश©

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