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11 May 2017

मजदूर हूँ मैं


06 May 2017

बस अब डूबना बाकी है


मंज़िल तो वही है  वहीं है 
पहुँचने की राह बदलनी बाकी है 
देखना है यहाँ सांसें कितनी बचीं 
कुछ और दूर चलना बाकी है । 

अरमान तो यह था कि चलेंगे साथ 
सात समुंदर पार तक 
मझधार पर भंवर में आ फंसा 
बस अब डूबना बाकी है। 

-यश©

04 May 2017

वह सामने होगा या नहीं।

अजीबो गरीब से
खयालातों में डूबा हुआ
नये हालातों में
कहीं खोया हुआ
गिन रहा हूँ दिन
जिंदगी के
कि जो आज है
वह कल होगा या नहीं
कल आज से बेहतर
या बदतर होगा कि नहीं
पर मैं
उलझन में  नहीं
निश्चिंत हूँ
मौन हूँ
सिर्फ यह देखने के लिए
जो मेरे मन में है
वह सामने होगा या नहीं।
.
~यश ©

15 October 2016

कुछ लोग-37

कुछ लोग
कुछ लोगों को समझ कर
खुद से नीचा
और खुद को
ऊंचा मान कर
न जाने किस गुमान में
हरदम खोए रह कर
सोए रहते हैं
गहरी नींद में
जो जब टूटती है
तब एहसास दिलाती है
उस अंतर का
जो होता है
घमंड
और स्वाभिमान में
शैतान
और इंसान में
पर उस अंतर को समझने में
हो जाती है कभी कभी देर
कि बस अपने अंधेरे में
खोए रह जाते हैं
कुछ लोग
हमेशा के लिए।

~यशवन्त यश ©

11 October 2016

समय की धारा


समय की धारा
तेज़ी से चलते चलते
अपने साथ बहा लेती है
बहुत से कल और आज को
भूत और वर्तमान को
सैकड़ों अवरोधो को भेद कर
कितनी ही बातों को
खुद में समेट कर
थोड़ी रेत का ढेर बन कर
कुछ रुकती है
थमती है
और फिर चलती है
समय की धारा
अपनी अबूझ
मंज़िल की ओर।
 
~यशवन्त यश©

12 April 2016

हज़रत गंज

नवाबों के शहर में जहाँ
बिखरे हैं कई रंग
हजरातों की बस्ती
जिसे कहते हैं हज़रत गंज ।

यह मेरे शहर की
धड़कन है
जान है
इसकी हर अदा पे फिदा
हर बूढ़ा और नौजवान है ।

यहाँ मोटरों के रेले हैं
चाटों के ठेले हैं
यहाँ के बरामदों में
सभ्यताओं के मेले हैं ।

बुर्कानशीं हैं यहाँ
तो बेपरवाह मस्तियाँ हैं
कॉफी की चुस्कीयों संग
साहित्य की गोष्ठियाँ हैं ।

पहनावे मिलते हैं यहाँ
दुकानों पे तरह तरह के
दिखावे दिखते हैं यहाँ
इन्सानों में तरह तरह के ।

मैंने देखा है यहाँ
जूठनों को चाटता बचपन
नवाबों का शहर और
हजरातों का हज़रत गंज।

~यशवन्त यश©

01 April 2016

मूर्खता

मूर्खता
हमारे भीतर
कहीं गहरे
रच बस कर
बना लेती है
अपना
मुस्तखिल ठौर
इस जीवन की
सच्चाईयों
बुराइयों
और
अच्छाइयों के साथ।
शुरू से अंत तक
शून्य से शून्य तक
उसी आरंभ पर
आ मिलकर
सब कुछ अपने में
समेटते हुए
मौन की भाषा में
कुछ कहते हुए
मूर्खता
जब निकलती है
बाहर
सनक और गंभीरता के
अबूझ आवरण से
तब
बन जाती है कारण
औरों के हास्य का
लेकिन खुद में
होती है एक विमर्श
क्या-क्यों और कैसे के
पल पल उभरते
असंख्य प्रश्नों का।

  ~यशवन्त यश©

25 March 2016

बस यूं ही

बस
यूं ही कभी
चलते चलते
थोड़ा रुक कर
सुस्ता कर
एक पड़ाव से
दूसरे पड़ाव की ओर
कंटीले गति अवरोधकों को
लांघ कर
जिंदगी का सफर
जब पहुंचता है
अपने अंत की ओर
तब रह जाता है
सिर्फ घूर घूर कर
देखना
दीये की
लड़खड़ाती -टिमटिमाती
बुझने को बेचैन
लौ की छटपटाहट।

~यशवन्त यश©

12 March 2016

कुछ लोग-36

अंध भक्ति के
रोग से ग्रस्त
कुछ लोग
अंतर नहीं कर पाते
सही और गलत का
कल्पना और
वास्तविकता का
जिंदा और मुर्दा का
आसमान और ज़मीन का .......
ऐसे लोग
हाथ मे सिर्फ लट्ठ लिए
हर पल तलाश मे रहते हैं
उस शिकार की
जो कर नहीं पाता सहन
उनके एकाकी मिथ्या
प्रलाप को......
कुछ लोग
सिर्फ खुद को
खुदा मानते हैं
हर कानून से ऊपर
हर नियम
हर अदालत से ऊपर
सिर्फ वो
उनका लट्ठ
और उनका निर्णय ही
सहिष्णु होता है
और जो वास्तव में
सच होता है
वह उनकी निगाह और
वर्चस्व में
गलत होता है।

~यशवन्त यश©
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