प्रतिलिप्याधिकार/सर्वाधिकार सुरक्षित ©

इस ब्लॉग पर प्रकाशित अभिव्यक्ति (संदर्भित-संकलित गीत /चित्र /आलेख अथवा निबंध को छोड़ कर) पूर्णत: मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित है।
यदि कहीं प्रकाशित करना चाहें तो yashwant009@gmail.com द्वारा पूर्वानुमति/सहमति अवश्य प्राप्त कर लें।

यदि आप चाहें तो हमें कुछ सहयोग कर सकते हैं

09 May 2011

संघर्ष अभी ज़ारी है

एक बार को लगा था
फूलों की राह पर
चल रहा हूँ

वक़्त बीतता गया
और फूल सूख गए
महसूस होने लगी
क़दमों तले तपन
दहकते पत्थरों की

पर चलना तो है ही
मैं चल रहा हूँ
फूलों से बचते हुए

हाँ इन फूलों की
खुशबू ज़रूर ले लेता हूँ

ले लेता हूँ
क्षणिक सुख
और सहेज लेता हूँ
तीखे काँटों को
अपने भीतर कहीं

अब एहसास ही नहीं होता
चुभन का
जलने का
और न अब
पैरों में छाले पड़ते हैं

पड़ चुकी है आदत
यूँ ही चलते जाने की
कहीं रुक कर
अपनी कहते जाने की

कोई सुने ना सुने
कोई फर्क नहीं
बस आज नहीं
शायद कल आने वाली
अपनी बारी है

संघर्ष अभी ज़ारी है.

21 comments:

  1. उफ़ ……………कितनी गहरी बात कह दी यशवत जी बेहद सरल शब्दो में………शानदार्।

    ReplyDelete
  2. पर चलना तो है ही
    मैं चल रहा हूँ
    फूलों से बचते हुए
    फूल जब सूखते है तो कंटक बन जाते है

    ReplyDelete
  3. बहुत गहराई से निकले शब्द| धन्यवाद|

    ReplyDelete
  4. बहुत अच्छा लिखा है ,शुभकामनायें !

    ReplyDelete
  5. 150 वीं पोस्ट के लिए बधाई ... सुन्दर रचना है ... अभी जीवन में बहुत संघर्ष करने हैं ... शुभकामनायें !

    ReplyDelete
  6. @इन्द्रनील सर --बहुत बहुत धन्यवाद! वैसे यह 150 वीं कविता है कुल पोस्ट्स अब190 हो चुकी हैं.

    ReplyDelete
  7. कोई सुने ना सुने
    कोई फर्क नहीं
    बस आज नहीं
    शायद कल आने वाली
    अपनी बारी है
    ....

    बहुत गहन और सार्थक प्रस्तुति..बहुत सुन्दर

    ReplyDelete
  8. अब एहसास ही नहीं होता
    चुभन का
    जलने का
    और न अब
    पैरों में छाले पड़ते हैं

    पड़ चुकी है आदत
    यूँ ही चलते जाने की
    kyonki kal apni baari hai, bahut badhiyaa

    ReplyDelete
  9. संघर्ष के जारी रहने में ही इसकी सार्थकता है

    ReplyDelete
  10. manobhavon ki sundar abhivyakti ! dhanywaad .

    ReplyDelete
  11. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति...... शुभकामनायें

    ReplyDelete
  12. संघर्ष अभी ज़ारी है.... such hi kaha apne ki abhi to sangrsh jaari hai...

    ReplyDelete
  13. कोई सुने ना सुने
    कोई फर्क नहीं
    बस आज नहीं
    शायद कल आने वाली
    अपनी बारी
    bahut aasha se judi sundar panktiyan.aap ke jeevan me aapki har aasha poori ho aisee hi shubhkamna hai.

    ReplyDelete
  14. सूखे हुए फूलों से भी आपको सुगंध मिल रही है ... अच्छी कविता !

    ReplyDelete
  15. बहुत गहन और सार्थक प्रस्तुति

    ReplyDelete
  16. सबसे अच्छी बात भी यही है कि
    संघर्ष अभी ज़ारी है!

    ReplyDelete
  17. जीवन एक चुनौती है..........देखो और स्वीकार करो..........बहुत बढ़िया लिखा है आपने

    ReplyDelete
  18. अब एहसास ही नहीं होता
    चुभन का
    जलने का
    और न अब
    पैरों में छाले पड़ते हैं

    पड़ चुकी है आदत
    यूँ ही चलते जाने की
    कहीं रुक कर
    अपनी कहते जाने की
    bahut sunder bhave liye achchi rachanaa.bahut-bahut badhaai aapko.

    ReplyDelete
  19. आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद!

    ReplyDelete

Popular Posts

+Get Now!