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17 May 2011

ओ लहरों!

[चित्र:गूगल सर्च ]
ओ! ऊंची उठती गिरती
मन मौजी लहरों!
ले चलो मुझे भी
अपने साथ

तुम्हारे  साथ
मैं भी जीना चाहता हूँ
तुम्हारे  जैसा  जीवन

टकराना  चाहता हूँ
पत्थरों से
छोड़ जाने को
अपने कुछ निशाँ

उन पत्थरों के बीच से
कुछ रास्ते बना कर
उनकी ऊंचाइयों को
लांघ कर

मैं भी चाहता हूँ
अनवरत बहना
बस बहते रहना
चलते रहना
तुम्हारी तरह.

23 comments:

  1. मैं भी चाहता हूँ
    अनवरत बहना
    बस बहते रहना
    चलते रहना
    तुम्हारी तरह.
    bahut khub Yashwant ji......

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  2. लहरों के संग जीने की चाहत एक परिक्रमा है जीवन की

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  3. वाह बहुत सुन्दर चाहत्।

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  4. लहरें जीवन के ऊर्जामय रूप का द्योतक बन सार्थक हो गयी ....बहुत खूब ....शुभकामनायें !

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  5. सकारात्मक सोच लिए अच्छी कविता।
    बहुत सुंदर चित्र लगाया है आपने।

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  6. लहरे तो बहेंगी ही, आप उनके साथ कदम मिलाएं वो जरूर आपके साथ बहेंगी , सुन्दर कविता

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  7. मनोहारी अद्भुत चित्रण लहरें के जीवन का....

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  8. अग्रिम शुभकामनाएं...
    अपने निशां बना पाने के लिए...

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  9. बहुत सार्थक सोच...बहुत सुन्दर रचना

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  10. बहुत खुब। शानदार सोच।

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  11. मैं भी चाहता हूँ
    अनवरत बहना
    बस बहते रहना
    चलते रहना
    तुम्हारी तरह

    बहुत सुंदर भाव...... सकारात्मक विचारों की गहन अभिव्यक्ति

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  12. टकराना चाहता हूँ
    पत्थरों से
    छोड़ जाने को
    अपने कुछ निशाँ

    उन पत्थरों के बीच से
    कुछ रास्ते बना कर
    उनकी ऊंचाइयों को
    लांघ कर

    मैं भी चाहता हूँ
    अनवरत बहना
    बस बहते रहना
    चलते रहना
    तुम्हारी तरह.
    भाई यशवंत जी बहुत सुंदर लिखते हैं आप बधाई और शुभकामनाएं |

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  13. टकराना चाहता हूँ
    पत्थरों से
    छोड़ जाने को
    अपने कुछ निशाँ

    पत्थरों से पास से निकल जा सकते है पर वो भी कोई जीना होगा ....बहुत सुन्दर

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  14. waah! bhut khub likha hai apne...is raj ko kya jaane sahil pe baithne vale,ham dub ke samjhe hai dariya teri gahrayi... !

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  15. सुंदर प्रेरणादायी शब्दों से सजी कविता ! शुभकामनायें.

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  16. यशवंत भाई का तो जवाब नहीं है
    बहुत ही सुंदर लिखते है

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  17. सकारात्मक विचारों की सुंदर अभिव्यक्ति....
    तुम समय की रेत पर छोड़ते चलो निशां... शुभकामनायें..........

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  18. आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद!

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  19. सारगर्भित तथा सार्थक रचना

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  20. टकराना चाहता हूँ
    पत्थरों से
    छोड़ जाने को
    अपने कुछ निशाँ

    अच्छी प्रस्तुति

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  21. उन पत्थरों के बीच से
    कुछ रास्ते बना कर
    उनकी ऊंचाइयों को
    लांघ कर
    sunder abhivyakti

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  22. टकराना चाहता हूँ
    पत्थरों से
    छोड़ जाने को
    अपने कुछ निशाँ
    जीवट से भरपूर एक अत्यंत प्रभावशाली रचना ! अति सुन्दर

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