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09 March 2012

क्यों फागुन चला आता है ? >> (वटवृक्ष पत्रिका के फरवरी 2012 -होली विशेषांक मे प्रकाशित )

न रागों की पहचान मुझे
न साज सजाना आता है
हैं रस- छंद- अलंकार अबूझे
न गीत बनाना आता है

क्या होते सप्तरंग सुर
संगीत,कोकिला ही जाने
है बहुत डगमग यह डगर
न रंग रचाना आता है

बस कहता है कुछ शब्द मन
भाव कहीं धुंधलाता है
अब तक यह न समझ सका
क्यों फागुन चला आता है ?

24 comments:

  1. बहुत ही सुंदर रचना,बेहतरीन प्रस्तुति,...
    रचना प्रकाशित होने के लिए बधाई...

    RESENT POST...फुहार...फागुन...

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  2. अब तक यह न समझ सका
    क्यों फागुन चला आता है ?
    ............ बहुत ही सुन्दर लिखा है यशवंत जी .
    रंगों से अंग भिगोने को
    साज औ राग सजाने को
    मन सराबोर करने को ही
    ये फागुन चला आता है

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  3. बहुत सुंदर भावों का संयोजन ...

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  4. फागुन के बात निराले॥
    सावन के रात निराले ... बहुत सुन्दर भाई

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  5. सुंदर भाव .......
    सुंदर रचना ...

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  6. बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति....

    होली की हार्दिक शुभकामनायें !

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  7. मन की एक मासूम सी अबूझ पहेली को सुंदर कविता में ढाल दिया है आपने ! बधाई !

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  8. बस कहता है कुछ शब्द मन
    भाव कहीं धुंधलाता है
    अब तक यह न समझ सका
    क्यों फागुन चला आता है ?
    बहुत सुन्दर भाव...

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  9. बहुत सुन्दर भाव भरे हैं।

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  10. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.
    आपको सपरिवार रंगों के पर्व होलिकोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ......!!!!

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  11. बहुत सुन्दर.............
    ढेर सारी बधाई भी.........

    सस्नेह.

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  12. सुन्दर भावाभिव्यक्ति....बधाई

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  13. Bahut hi sundar bhavabhivyakti!
    Dheron shubhkaamnayen!
    Saadar

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  14. colorful n vibrant post :)
    belated happy holi to u yash !!!

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  15. बेहतरीन भावो का संयोजन..
    सुंदर रचना...

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  16. बस कहता है कुछ शब्द मन
    भाव कहीं धुंधलाता है
    अब तक यह न समझ सका
    क्यों फागुन चला आता है ? thodi busy thi to holi me apki itni khubsurat rachna padh nhi paayi.... aaj padha to kuch kahe na aisa ho nhi sakta tha.... aap ne likha hi itna accha hai..... bhaut hi acchi lagi....

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