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28 June 2013

देख नहीं सकता

ऊपर वाले की नेमत से मिली हैं दो आँखें
चार दीवारी की बंधी पट्टी के उस पार
देख नहीं सकता।

मैं महफूज हूँ अपनी ही चादर में सिमट कर
बाहर निकल कर खुले जिस्मों को
देख नहीं सकता।

नीरो की तरह बांसुरी बजा कर अपनी मस्ती में
मुर्दानि में झूमता हूँ किसी को रोता
देख नहीं सकता।

ऊपर वाले की नेमत से मिली हैं दो आँखें
इंसान के लबादे में इंसा को
देख नहीं सकता।  

~यशवन्त माथुर©

19 comments:

  1. WAAH BAHUT HI GAHAN BAT KAH DI KAVITA KE MADHAM SE .......

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  2. आज के इंसान की इंसानियत ऐसी ही हो गयी है... अच्छी प्रस्तुति !!

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  3. आपके जज़बात को नमन
    हार्दिक शुभकामनायें

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  4. बढिया कटाक्ष .......

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  5. bahut sundar bat kahi hai . insaan to ab labadon men hi milane lage hain kitne hain jinka charitra aur man paardashi kaha jaay .

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  6. बहुत ख़ूबसूरत प्रस्तुति...

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  7. theme toh badiya hai par thodi adhoori si lagi .. ise kuchh aur badhaa sakte the aap abhi lagta hai ki abhi bhi kuchh ankaha rah gaya hai

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  8. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(29-6-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

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  9. सुन्दर अभिव्यक्ति आज अंतर्दृष्टि भी बाधित लगती है

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  10. बहुत खूब ...वैसे इन्सान समझ भी कहां आता है ..

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  11. मार्मिक प्रस्तुति..
    आज की इंसानियत कहे या इन्सान का स्वार्थ और उसकी व्यस्तता

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  12. वाह, बहुत खूब कही!

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