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14 March 2015

विषयों की कमी नहीं

मन
कितनी दूर तक
उड़ता चला जाता है
समय और देश की
सीमाओं के पार
बहुत दूर
उम्र से
सैकड़ों मील आगे
सैकड़ों मील पीछे
फिर भी
कभी कभी लगता है
जैसे कुछ छूट रहा है
रह रहा है
यहीं कहीं
अपने आस पास का
कोई किस्सा
कोई कहानी
कोई गीत
संयोग -वियोग
वीर और रौद्र रस में पगा
अलंकारों से सजा
छंदों मे ढला
अतुकांत या तुकांत
कुछ भी
जो लिखते लिखते
रह जाता है
अधूरा
पूरा होने की तमन्ना लिए
गिनता रहता है दिन
किसी पन्ने पर 
कहीं दबे छिपे
मन की ऊंची
उड़ानों के साथ
तोड़ देता है दम
क्योंकि
इस सतरंगी दुनिया में
नये विषयों की कमी नहीं। 

~यशवन्त यश©

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