प्रतिलिप्याधिकार/सर्वाधिकार सुरक्षित ©

इस ब्लॉग पर प्रकाशित अभिव्यक्ति (संदर्भित-संकलित गीत /चित्र /आलेख अथवा निबंध को छोड़ कर) पूर्णत: मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित है।
यदि कहीं प्रकाशित करना चाहें तो yashwant009@gmail.com द्वारा पूर्वानुमति/सहमति अवश्य प्राप्त कर लें।

यदि आप चाहें तो हमें कुछ सहयोग कर सकते हैं

12 May 2021

लॉकडाउन

मिले दवा  न मिले दवा 
वो गुरबत से दबा दबा 
खुली छत के कमरे में 
बंद पलकों में है दुआ 

उसके बच्चे भूखे-प्यासे 
माँ के आँसू पी-पी कर 
पिता की ताला-बंदी में 
रहना कठिन यूँ जी कर  

ककहरा को भूल काल 
अब क्या लिख लाया है 
हर पन्ने पर एक हर्फ़ ही 
कुछ समझ न आया है । 

-यशवन्त माथुर©
12052021

9 comments:

मॉडरेशन का विकल्प सक्षम होने के कारण आपकी टिप्पणी यहाँ प्रदर्शित होने में थोड़ा समय लग सकता है।

कृपया किसी प्रकार का विज्ञापन टिप्पणी में न दें।

केवल चर्चामंच का लिंक ही दिया जा सकता है, इसके अलावा यदि बहुत आवश्यक न हो तो अपने या अन्य किसी ब्लॉग का लिंक टिप्पणी में न दें, अन्यथा आपकी टिप्पणी यहाँ प्रदर्शित नहीं की जाएगी।

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 13-05-2021को चर्चा – 4,064 में दिया गया है।
    आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी।
    धन्यवाद सहित
    दिलबागसिंह विर्क

    ReplyDelete
  2. सबकुछ धुआँ धुआँ, जिंदगी क्या है समझ से परे होता जा रहा है आजकल

    ReplyDelete
  3. उत्कृष्ट रचना

    ReplyDelete
  4. बहुत सुन्दर

    ReplyDelete
  5. बहुत सुन्दर

    ReplyDelete
  6. सार्थक अभिव्यक्ति

    ReplyDelete
  7. बहुत ही सुंदर प्रस्तुति

    ReplyDelete
  8. वर्तमान समय की विभीषिका को चन्द शब्दों में बयान कर दिया है, कभी तो अंत होगा इस आपदा का, इसी उम्मीद पर दुनिया जिए चली जाती है

    ReplyDelete
  9. समसामयिक,मर्म स्पर्शी सृजन ।

    ReplyDelete

Popular Posts

+Get Now!