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07 May 2021

सबकी सुनता जाऊंगा.........

शब्दों के इस अथाह समुद्र की 
क्या तली को कभी छू पाऊँगा?
या ऐसे ही इन लहरों के संग 
अन्त तक बहता जाऊंगा ?

नहीं पता कहाँ पर मंज़िल
कब तक चलते जाना है ?
कितने कदम बढ़ चुका अब तक
और कितना थकते जाना है ? 

अपनी हदों के भीतर से
क्या बाहर कभी आ पाऊँगा ?
या निर्जीव दीवार के जैसे
सबकी सुनता जाऊंगा?

-यशवन्त माथुर©
29/01/2019

5 comments:

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  1. हदों को जान लिया जिसने वही हदों से पार भी जा सकता है, और दीवारों के भी कान होते हैं ! सुंदर सृजन !

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  2. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

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  3. प्रयास कर रहा हूँ आपकी अभिव्यक्ति के मर्म को समझने का।

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  4. सुंदर भावों की गहरी अभिव्यक्ति,अच्छी रचना..

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