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04 May 2021

जाने क्या काल ने ठाना है?

कितने ही चले गए 
और कितनों को जाना है 
थोड़ी सी ज़िंदगी है 
या मौत का बहाना है। 

अपनों का रुदन सुन-सुन कर 
गैरों की भी आँखें भरती हैं 
हर एक दिन की आहट पर 
क्या होगा सोच कर डरती हैं। 

दहशत बैठी मन के भीतर 
बाहर गहरे सन्नाटे में 
काली रात से इन दिनों में 
जाने क्या काल ने ठाना है?

(डॉक्टर वर्षा सिंह जी एवं मेरे मित्र डॉक्टर प्रशांत चौधरी,SDM,बरेली को विनम्र श्रद्धांजलि, 
जिनके असमय जाने से मेरा दिल टूट गया है)

-यशवन्त माथुर©
04052021

8 comments:

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  1. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (5 -5-21) को "शिव कहाँ जो जीत लूँगा मृत्यु को पी कर ज़हर "(चर्चा अंक 4057) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    --
    कामिनी सिन्हा

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  2. मार्मिक सृजन सर,आज के इस माहौल में भी इंसानियत नहीं जागी तो शायद कभी नहीं जागेगी ,सादर नमन

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  3. हृदय स्पर्शी! यशवंत जी आपने सही के दर्द को शब्द दे दिए।
    यथार्थ भाव लेखन।
    किसी भी आड़म्बर से परे ।
    साधुवाद।

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  4. सच में कोरोना काल ने किसी के अपने छीने तो किसी के सपने! और आगे का पता नहीं!

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  5. सामयिक रचना

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  6. मैं आपके मन की हालत का अंदाज़ा लगा सकता हूँ आदरणीय यशवंत जी। न अपनों की मौत सही जा सकती है, न ही सपनों की। यह मुश्किल वक़्त तो जैसे-तैसे हौसला बनाए रखने का है।

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  7. हर इंसान के मन के भावों को आपने शब्द दे दिए। सार्थक सृजन।आपको मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ।

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  8. कोरोना ने न जाने कितने जीवन छीन लिये हैं और अब भी उसका कहर जारी है. यह घड़ी बहुत विचित्र है, अपनी सुरक्षा के साथ साथ औरों की सुरक्षा की चिंता हमें पहले करनी है, हमारी वजह से किसी को संक्रमण न हो, इसके लिए सदा सजग रहना है. दिवंगत आत्माओं को विनम्र श्रद्धांजलि !

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