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04 May 2021

जाने क्या काल ने ठाना है?

कितने ही चले गए 
और कितनों को जाना है 
थोड़ी सी ज़िंदगी है 
या मौत का बहाना है। 

अपनों का रुदन सुन-सुन कर 
गैरों की भी आँखें भरती हैं 
हर एक दिन की आहट पर 
क्या होगा सोच कर डरती हैं। 

दहशत बैठी मन के भीतर 
बाहर गहरे सन्नाटे में 
काली रात से इन दिनों में 
जाने क्या काल ने ठाना है?

(मेरे मित्र डॉक्टर प्रशांत चौधरी,SDM,बरेली को विनम्र श्रद्धांजलि, 
जिनके असमय जाने से मेरा दिल टूट गया है)

-यशवन्त माथुर©
04052021

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