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18 May 2021

कोविड के इस असर की तो बात ही नहीं हो रही: जयंती लाल भंडारी


आज के नवभारत टाईम्स में प्रबुद्ध अर्थशास्त्री श्री जयंती लाल भंडारी का एक महत्त्वपूर्ण आलेख प्रकाशित हुआ है, जिसमें उन्होंने लॉकडाउन के चलते उत्पन्न हुए रोजगार संकट पर तर्कसंगत प्रकाश डाला है। 
संकलन की दृष्टि से यह आलेख साभार यहाँ प्रस्तुत है- 

कोविड के इस असर की तो बात ही नहीं हो रही
कोरोना की दूसरी लहर के बीच देश में आर्थिक, औद्योगिक, रोजगार के मोर्चे पर चुनौतियां बढ़ने और स्वास्थ्य क्षेत्र के बुनियादी ढांचे के चरमरा जाने से मध्यम वर्ग की मुश्किलें बढ़ गई हैं। जहां सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग (एमएसएमई) और स्व-रोजगार करने वाले मध्यम वर्ग के लोग अपने कारोबार पर पड़ रहे प्रतिकूल प्रभाव को लेकर चिंतित हैं, वहीं नौकरीपेशा आमदनी घटने जैसी परेशानियां झेल रहे हैं। अमेरिका के प्यू रिसर्च सेंटर की एक रिपोर्ट के मुताबिक महामारी के कारण आए आर्थिक संकट से वर्ष 2020 के दौरान भारत में मध्यम वर्ग के लोगों की संख्या 9.9 करोड़ से घटकर 6.6 करोड़ रह गई। मध्यम वर्ग में उन लोगों को माना गया है, जो 10 डॉलर से 20 डॉलर यानी करीब 700 रुपये से 1500 रुपये प्रतिदिन कमाते हैं।

पाबंदियों का प्रभाव
इसमें दो मत नहीं कि पिछले साल आई कोरोना की पहली लहर ही मध्यम वर्ग की आमदनी काफी घटा चुकी थी। मध्यम वर्गीय परिवारों पर कर्ज का बोझ भी बढ़ा है। ऐसे में कोरोना की दूसरी लहर के प्रभावों को लेकर चिंता और बढ़ जाती है। खासतौर पर कोविड के इलाज के लिए जिस तरह से पैसा खर्च करना पड़ रहा है, उससे बड़े पैमाने पर मध्यम वर्गीय लोगों की बचत में सेंध लगी है। उधर, सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि मार्च 2021 की तुलना में अप्रैल 2021 में देश ने 75 लाख नौकरियां गंवाई हैं। इसके कारण बेरोजगारी दर बढ़ी है। खासकर संक्रमण बढ़ने के साथ कई राज्यों में लॉकडाउन जैसी पाबंदियां लगाए जाने से आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिकूल असर पड़ा है। इससे अप्रैल 2021 में बेरोजगारी दर चार महीने के सबसे ऊंचे स्तर 8 प्रतिशत पर पहुंच गई। शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी दर 9.78 प्रतिशत है तो ग्रामीण क्षेत्रों में 7.13 प्रतिशत। इससे पहले, मार्च 2021 में बेरोजगारी दर 6.50 प्रतिशत थी और स्वाभाविक ही अप्रैल की तुलना में ग्रामीण और शहरी दोनों जगह यह दर कम थी।

इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कोरोना के दूसरे घातक संक्रमण के बीच फिलहाल रोजगार के मोर्चे पर स्थिति उतनी बुरी नहीं है, जितनी कि 2020 में पहले देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान देखी गई थी। उस समय बेरोजगारी दर 24 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। यह तथ्य भी उभरकर सामने आ रहा है कि कोरोना की दूसरी लहर को नियंत्रित करने के लिए देशव्यापी कठोर लॉकडाउन के बजाय प्रदेश स्तर की पाबंदियां लगाने की जो नीति अपनाई गई, उससे उद्योग-कारोबार और रोजगार पर पहली लहर जैसा तीखा प्रभाव नहीं पड़ा है।

लेकिन मध्यम वर्ग के सामने कुछ अलग तरह की मुश्किलें जरूर दिखाई दे रही हैं। जहां वर्क फ्रॉम होम की वजह से टैक्स में छूट के कुछ माध्यम कम हो गए हैं, वहीं डिजिटल तकनीक पर निर्भरता के कारण ब्रॉडबैंड जैसे खर्चों में इजाफा हो गया है। मई 2021 की शुरुआत से ही वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से भारत में भी पेट्रोल-डीजल की कीमतों में उछाल के साथ-साथ महंगाई बढ़ती दिखाई दे रही है। नतीजा यह कि इस समय मध्यम वर्ग के करोड़ों लोगों के चेहरे पर बच्चों की शिक्षा, रोजगार, कर्ज पर बढ़ते ब्याज और नियमित रूप से ईएमआई चुकाने की मजबूरी से जुड़ी चिंताएं साफ नजर आती हैं।

इसमें दो मत नहीं कि सरकार ने छोटे उद्योग-कारोबार से जुड़े मध्यम वर्ग की मुश्किलों को दूर करने के लिए कुछ कदम उठाए हैं। 5 मई को रिजर्व बैंक ने व्यक्तिगत कर्जदारों और छोटे कारोबारों के लिए कर्ज पुनर्गठन की सुविधा बढ़ाई है और कर्ज का विस्तार किया है, उससे जरूर राहत मिलेगी। इस नई सुविधा के तहत 25 करोड़ रुपये तक के बकाये वाले वे कर्जदार अपना लोन दो साल के लिए पुनर्गठित करा सकते हैं, जिन्होंने पहले मॉरेटोरियम या पुनर्गठन का लाभ नहीं लिया है। यह नई घोषित सुविधा 30 सितंबर, 2021 तक उपलब्ध होगी। स्वास्थ्य क्षेत्र की वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए आरबीआई ने 50,000 करोड़ रुपये की नकदी की व्यवस्था की है। इस योजना के तहत बैंक टीकों और चिकित्सकीय उपकरणों के विनिर्माण, आयात या आपूर्ति से जुड़े कारोबारियों को कर्ज दे सकेंगे। इसके अलावा बैंक अस्पतालों, डिस्पेंसरियों और पैथॉलजी लैब्स को भी कर्ज दे सकेंगे।

निसंदेह मध्यम वर्ग को मुश्किलों से निकालने के लिए उसकी क्रय शक्ति बढ़ाने वाले अधिक उदार कदम जरूरी हैं। सरकार ने पिछले वित्त वर्ष 2020-21 में कोरोना काल में मार्च से अगस्त के छह माह के लिए लोन मॉरेटोरियम दिया था। अब आरबीआई द्वारा एमएसएमई के कर्ज को एनपीए की श्रेणी में डालने के नियम आसान बनाने होंगे। एमएसएमई क्षेत्र में कर्ज को एनपीए मानने के लिए मौजूदा 90 दिन की अवधि को बढ़ाकर 180 दिन किया जाना लाभप्रद होगा। आपात कर्ज सुविधा गारंटी योजना (ईसीएलजीएस) को आगे बढ़ाने या उसे नए रूप में लाने जैसे कदम भी राहतकारी होंगे।

नया डायरेक्ट टैक्स कोड
इस समय मौजूदा वित्त वर्ष 2021-22 के बजट के तहत स्वास्थ्य, शिक्षा, उद्योग-कारोबार, शेयर बाजार और बुनियादी ढांचे के विकास से संबंधित विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी लाने की जरूरत है। यह भी उल्लेखनीय है कि नवंबर 2017 में नई प्रत्यक्ष कर संहिता के लिए अखिलेश रंजन की अध्यक्षता में गठित टास्क फोर्स द्वारा विभिन्न देशों की प्रत्यक्ष कर प्रणालियों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लागू प्रत्यक्ष कर संधियों का तुलनात्मक अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट 19 अगस्त, 2019 को सरकार को सौंपी जा चुकी है। ऐसे में अब रंजन समिति की रिपोर्ट के मद्देनजर नए डायरेक्ट टैक्स कोड और नए इनकम टैक्स कानून को मूर्त रूप देकर छोटे आयकरदाताओं व मध्यम वर्ग को नई राहत दी जा सकती है। 15वें वित्त आयोग की सिफारिशों के मद्देनजर इस समय स्वास्थ्य क्षेत्र पर जो सावर्जनिक व्यय जीडीपी का करीब 1 फीसदी है, उसे बढ़ाकर ढाई फीसदी तक ले जाने से मध्यम वर्ग को स्वास्थ्य संबंधी खर्चों में बचत के रूप में बड़ी राहत मिलेगी।

-जयंती लाल भंडारी©

2 comments:

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  1. कोरोना के द्वारा मध्यम वर्ग के साथ-साथ निम्न वर्ग को भी भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है, लेख में बताये उपाय काफी कारगर सिद्ध हो सकते हैं.

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  2. सार्थक और उपयोगी लेखन ।सादर शुभकामनाएं यशवंत जी ।

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