अभावों के भाव
इसी मौसम में बढ़ते हैं
जब ‘नाम’ की उम्मीद में भाव
दर दर भटकते हैं
कहीं कंबल ऊनी
कहीं कागजी दुशाले हैं किस्मत में
रैन बसेरों में
सीले अलाव भी ठिठुरते हैं
हैं वो ही ‘यशवंत’
जो बंद कमरों में बैठ कर
आरंभ से अंत तक
बेतुकी लिखा करते हैं
अभावों के भाव
इसी मौसम में बढ़ते हैं
जब भरी धूप में भाव
बर्फ से जमते हैं ।
©यशवन्त माथुर©
इसी मौसम में बढ़ते हैं
जब ‘नाम’ की उम्मीद में भाव
दर दर भटकते हैं
कहीं कंबल ऊनी
कहीं कागजी दुशाले हैं किस्मत में
रैन बसेरों में
सीले अलाव भी ठिठुरते हैं
हैं वो ही ‘यशवंत’
जो बंद कमरों में बैठ कर
आरंभ से अंत तक
बेतुकी लिखा करते हैं
अभावों के भाव
इसी मौसम में बढ़ते हैं
जब भरी धूप में भाव
बर्फ से जमते हैं ।
©यशवन्त माथुर©