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09 July 2012

शब्दों की मेड़

यहीं कहीं तो थी
शब्दों की वह मेड़
जिससे घेरा था
तरल मन को
बह जाने से रोकने को

वह मेड़ मजबूत थी
ठोस और अटल थी
विश्वास ,उत्साह  और
स्वाभिमान से लिपी पुती थी

शायद आत्ममुग्ध भी थी

तरल मन के भीतर की
अस्थिर लहरों की
धीमी धीमी चोटों से
आहत
शब्दों की 
वह मेड़
बिखर कर,टूट कर 
अब खो चुकी है कहीं
हमेशा के लिये

और मैं जुटा हूँ
पहले से मजबूत
एक और
नयी मेड़ बनाने में । 

©यशवन्त माथुर©

27 comments:

  1. बहुत सुन्दर यशवंत...

    सस्नेह

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  2. शब्दों की मेड़ मज़बूत से मज़बूत बने और भावों की वो सघनता सृजित हो जो हर बार मेड़ को बहा ले जाए, नयी मेड़ के सृजन का मार्ग प्रशस्त करती हुई...!
    सुन्दर रचना!

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  3. वह मेड़ मजबूत थी
    ठोस और अटल थी
    विश्वास ,उत्साह और
    स्वाभिमान से लिपी पुती थी
    फिर बिखर नहीं सकती वक़्त की धूल जम गई होगी, ध्यान से देखें तो मेड़ वहीं कहीं होगी.... शुभकामनायें

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  4. वाह ... बहुत ही बढिया।

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  5. और मैं जुटा हूँ
    पहले से मजबूत
    एक और
    नयी मेड़ बनाने में । .बहुत ही आशावादी विचार एवम अभिव्यक्ति ..

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  6. wah:) bahut sundar yashwant ji

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  7. बहुत ही सुन्दर लगी पोस्ट।

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  8. बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति. सुन्दर रचना. :-).
    आज का आगरा

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  9. एक मेड़ टूटना अन्त नही है....पुनर्निर्माण का सुन्दर सन्देश

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  10. शब्दों की अनवरत गहन अभिवयक्ति......

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  11. सकारात्मक सोच व्यक्त करती रचना...
    इस बार आपकी यह मेड़
    बहुत मजबूत बने..कभी न टूटे ...
    शुभकामनाये :-)

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  12. Very nice post.....
    Aabhar!
    Mere blog pr padhare.

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  13. विश्वास ,उत्साह और
    स्वाभिमान से लिपी पुती मेढ़ तो मजबूती लिए ही होगी.... बहुत सुंदर लिखा है...

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  14. उत्कृष्ट अभिव्यक्ति.

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  15. और मैं जुटा हूँ
    पहले से मजबूत
    एक और
    नयी मेड़ बनाने में ।

    आपकी हिम्मत , सकारात्मक सोच ,
    आशावादी विचार की जीतनी प्रशंसा की जाए कम होगी .... :)

    शुभकामनाएं .... !!

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  16. बहुत सुन्दर रचना !
    सादर
    कलमदान

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  17. शब्दों की मेड़ ... सुंदर बिम्ब ले कर रची रचना

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  18. बेह्द उम्दा रचना सुन्दर भावो को सहेजे

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  19. जीवन के खट्टे मीठे अनुभव..इस मेढ़ को अक्सर लहो लुहान कर देते हैं ......लेकिन अहसासों को बांधना भी ज़रूरी होता है ...बस पुनर्निर्माण का यह क्रम यूहीं सतत चलता रहता है ...बहुत सुन्दर रचना

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  20. और मैं जुटा हूँ
    पहले से मजबूत
    एक और
    नयी मेड़ बनाने में ।
    आशा की नई किरण की तरह,सुन्दर भाव,सुन्दर रचना...

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  21. वाह ! बहुत हिम्मत भरा भाव !

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  22. वाह बहुत खूब ....सादर

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  23. और मैं जुटा हूँ
    पहले से मजबूत
    एक और
    नयी मेड़ बनाने में ।
    वाह बहुत खूबसूरत अहसास हर लफ्ज़ में आपने भावों की बहुत गहरी अभिव्यक्ति देने का प्रयास किया है... बधाई आपको... सादर वन्दे
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