प्रतिलिप्याधिकार/सर्वाधिकार सुरक्षित ©

इस ब्लॉग पर प्रकाशित अभिव्यक्ति (संदर्भित-संकलित गीत /चित्र /आलेख अथवा निबंध को छोड़ कर) पूर्णत: मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित है।
यदि कहीं प्रकाशित करना चाहें तो yashwant009@gmail.com द्वारा पूर्वानुमति/सहमति अवश्य प्राप्त कर लें।

यदि आप चाहें तो हमें कुछ सहयोग कर सकते हैं

09 December 2012

फर्क नहीं पड़ता

आए कोई न आए इस दर पर
फर्क नहीं पड़ता
नकाब मे चेहरा छुपा कर
कुछ कह जाए
फर्क नहीं पड़ता

शब्दों की इन राहों पर
शब्दों के तीखे मोड़ों पर
शब्दों के भीड़ भरे मेलों में
मिल जाए कोई या बिछड़ जाए
फर्क नहीं पड़ता 

न आने से पहले कहा था कुछ
न जाने से पहले कुछ कहना है
इस लाईलाज नशे मे डूब कर
खुश होना कभी बिखरना है

यह महफिल नहीं रंगों की
न रंग बिरंगे पर्दे हैं
कभी गरम तो सर्द हवा संग
एक मन और उसकी बाते हैं

हम तो चलते चलते हैं
यूं ही कुछ कुछ कहते हैं
कुछ मे कभी कुछ न मिले तो
अर्थ अनर्थ को
फर्क नहीं पड़ता। 

©यशवन्त माथुर©

18 comments:

मॉडरेशन का विकल्प सक्षम होने के कारण आपकी टिप्पणी यहाँ प्रदर्शित होने में थोड़ा समय लग सकता है।

कृपया किसी प्रकार का विज्ञापन टिप्पणी में न दें।

केवल चर्चामंच का लिंक ही दिया जा सकता है, इसके अलावा यदि बहुत आवश्यक न हो तो अपने या अन्य किसी ब्लॉग का लिंक टिप्पणी में न दें, अन्यथा आपकी टिप्पणी यहाँ प्रदर्शित नहीं की जाएगी।

  1. ई मेल पर प्राप्त-

    superb. Mathurji.
    Madan Mohan saxena

    ReplyDelete
  2. ई मेल पर प्राप्त-

    indira mukhopadhyay


    बहुत खूब यशवंतजी। पर आप कविता लिखते रहिये हमें फर्क पड़ता है।

    ReplyDelete
  3. फर्क तो पड़ गया

    आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 12/12/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

    ReplyDelete
  4. धन्यवाद दीदी

    ReplyDelete
  5. काश ऐसा ही हो कोई कुछ भी कहे या करे हमें फर्क ना पड़े...
    :-)

    ReplyDelete
  6. धन्यवाद रीना जी

    ReplyDelete
  7. ई मेल से प्राप्त टिप्पणी

    विभा रानी श्रीवास्तव


    अरे ऐसे कैसे .......... आपने कह दिया हमने मान लिया ......... ??

    मुझे तो बहुत फर्क पड़ता है !

    ReplyDelete
  8. बहुत बहुत धन्यवाद आंटी

    ReplyDelete
  9. फ़र्क पड़ता है यशवंत ....किसी की तकलीफ़ पर प्यार के दो बोलों के मरहमसे फर्क पड़ता है .....और भी ऐसे ग़म हैं ज़माने में ......जिन्हें शब्दों की बैसाखी से फ़र्क पड़ता है ...आज़मा के देखो

    ReplyDelete
  10. ज़रूर आंटी!
    आपका बहुत बहुत धन्यवाद !

    ReplyDelete
  11. फर्क नहीं पड़ता तो आज ये लिखा भी नहीं जाता .... सुंदर प्रस्तुति

    ReplyDelete
    Replies
    1. सच में फर्क नहीं पड़ता आंटी। लिखने की बात तो यह है आंटी कि 6 साल की उम्र से आदत सी पड़ गयी है कुछ न कुछ लिखने की :)

      Delete
  12. हाँ यशवंत ..ये तो दिल को बहलाने वाली बात है...फर्क तो पड़ता है...काश के न पड़ता....

    सस्नेह

    अनु

    ReplyDelete
  13. धन्यवाद दीदी।

    ReplyDelete
  14. जेवण में बातों का फर्क न पड़े तो जीवन आसान हो जायगा ... पर शायद ऐसा होता नहीं ...

    ReplyDelete
  15. बहुत बहुत धन्यवाद सर!

    ReplyDelete
  16. चलना बहुत जरूरी है यशवंत भाई, यभी तो पत्थर और फूल का बोध हो. बहुत सुन्दर लगी आपकी कविता.

    ReplyDelete
  17. बहुत बहुत धन्यवाद निहार जी।

    ReplyDelete

Popular Posts

+Get Now!