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01 February 2019

इक भूली दास्ताँ बन जाऊं .......

गुज़र जाऊं कि
इक भूली दास्ताँ बन जाऊं
मर जाऊं कि
फिर कभी याद न आऊं
पा लिया सब कुछ
अब  खोने को कुछ न बचा
ये ठौर ऐसा है कि
रुकने को कुछ न बचा
आखिरी तमन्ना है कि
बहुत जीता हार कुछ तो जाऊं
समय संग बीत जाऊँ कि
फिर इधर न लौट कर आऊँ।

-यश ©
24/01/2019 

1 comment:

  1. इतनी निराशा..अभी तो बसंत आया है..जीवन तो अभी शुरू ही हुआ है..

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