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09 March 2021

.......है तो मुमकिन है

वह चाहे तो होली को दीवाली,
दीवाली को होली बोल दे।

इतिहास की जिल्द बंधी किताब के,
सारे पन्ने खोल दे।

वह चाहे तो भाषा के सारे मानक गिराकर,
खुद को खुद ही के तराजू पर तोल दे।

उसका सपना आधुनिक को प्राचीन बनाकर,
अंगीठियों के दौर में पहुंचाके सब धुंए में उड़ाना है।

वह जोड़ने की बात करता तो है, लेकिन,
टुकड़ों में बांटकर उसे दोस्तों का जहां बनाना है।

उसे नहीं मतलब कि सालों पहले जो बना तो क्यों बना, 
मेहनत की जमा पूंजी कुतर्कों से बेचते जाना है। 
 
और एक हम हैं कि बस दो रंगों में ही उलझ कर,
तय कर बैठे हैं कि उसी के जाल में फंसते ही जाना है।

-यशवन्त माथुर©
09032021

21 comments:

  1. ये हुई क़लम की धार
    बहुत ख़ूब
    बस क़लम का ही सहारा है इस दौर में।
    नई रचना

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  2. जवाब नहीं, वह जोड़ने की बात तो करता है, का

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  3. सार्थक सन्दर्भ..

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  4. बहुत सुन्दर

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  5. बहुत सुन्दर सृजन।

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  6. बहुत सुन्दर

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  7. समय बदल रहा है और बदलते हुए समय के साथ जो नहीं बदलते वे पीछे रह जाते हैं

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  8. मैं तो आपकी इस कविता का मर्म समझ गया हूँ यशवन्त जी । बाकी पाठक भी समझे हैं या नहीं, कहना मुहाल है । बहरहाल, आपका एक-एक लफ़्ज़ सच है और सच के सिवा कुछ नहीं है ।

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    Replies
    1. आपने बिल्कुल सही समझा सर! शायद और लोग नहीं समझे वरना इतनी भी टिप्पणियाँ नहीं आतीं :)

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  9. बहुत सुन्दर सर

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