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08 May 2020

मुफ़्त में आते हैं कुछ लोग......

मुफ़्त में आते हैं कुछ लोग जहाजों में हँसते-हँसते।  
मर जाते हैं यहाँ मजदूर रस्तों पर चलते-चलते।  
 
सुबह-शाम जो भूख से कुलबुलाते हैं।  
किराए बेशर्मी से उनसे मांगे जाते हैं। 

ये दौर बदहाली का याद तब तक रखना होगा। 
जब तक मशीन पर बटन उंगली से दबना होगा। 

और क्या कहें कि कागजी मशवरे भी उड़ जाते हैं। 
और उनके हर्फ़ सिर्फ आम को ही नजर आते हैं। 

-यशवन्त माथुर ©
08/05/20

हम बात करेंगे

मिलें न मिलें मंज़िलें
हमराह चलेंगे।
मिलेगा मौका जब भी
हम बात करेंगे।

चौराहे हैं यहाँ कई
कभी तो पार करेंगे।
थक कर कहीं बैठे तो
हम बात करेंगे।

कल को भूल कर आज
ही इतिहास रचेंगे।
जब कुछ न लिख सकेंगे
तो हम बात करेंगे।

-यशवन्त माथुर ©
08/05/2020

07 May 2020

काश ! सब समझ पाते

काश ! सब समझ पाते
जो बिखरे हुए हैं
एक हो पाते।

काश! सब हो सकते दूर
अपने भूत से
भविष्य से बेफ़िकर हो
वर्तमान में जी पाते।

काश! बुद्ध फिर से आते
धरती पर और
भटकी राहों को
एक कर पाते।

काश! सब समझ सकते
मर्म एक ही सत्य का
जिसे धारण करके
धर्म पर चल पाते।

-यशवन्त माथुर ©
07/05/2020

06 May 2020

वो मजदूर हैं , मजबूर नहीं


मंजिल तक पहुँचने की                                                                              
जद्दोजहद 
उनसे 
न जाने क्या क्या 
करवा देती है 
कभी काँटों पर 
चलवा देती है 
भूखे-प्यासे 
नंगे कदमों से 
मीलों को नपवा देती है। 
वो
बेरोजगार हो कर भी 
अदा करते हैं 
हर कीमत 
सिर्फ इसलिए 
कि देख सकें 
चेहरे 
अपने बिछुड़े हुए 
परिवार 
भूले हुए यार 
और बिसरे हुए 
खेतों की उस माटी के 
जिससे हो चुके थे बहुत दूर 
कुछ कमाने की 
कुछ पाने की 
दुश्वारी में।  
लेकिन 
यहाँ हम 
अपनी मरी हुई संवेदनाओं 
की शोकसभा 
हर चौराहे पर 
मनाते हुए 
न कभी समझे हैं 
न कभी समझेंगे 
कि 
हमारे विलासी जीवन की 
नींव  का हर आधार 
रखने वाले 
वो 
मजदूर हैं 
लेकिन मजबूर नहीं। 

-यशवन्त माथुर ©
06/05/2020

05 May 2020

ऐसा दौर है यह

ऐसा दौर है यह 
कि एक तरफ भूखे-नंगे 
और बेघर 
दो वक्त पेट भर 
खाने की तलाश में हैं । 
ऐसा दौर है यह 
कि दूसरी तरफ 
शराब के ठेकों पर लगी भीड़ 
रात के जामों की 
आस  में है। 
ऐसा दौर है यह 
कि और गहरी 
होती जा रही है लकीर 
अमीरी और गरीबी के बीच की।  
ऐसा दौर है यह
कि हर कोई 
कर रहा है तलाश 
जी लेने की तरकीब की। 
ऐसा दौर है यह 
कि उम्मीदी और ना-उम्मीदी 
आमने-सामने खड़े होकर 
एक दूसरे को देखते हैं 
नजरें फेरते हैं 
और पकड़ लेते हैं 
अपने-अपने हिस्से की 
स्याह-सफेद राहें । 

-यशवन्त माथुर ©
05/05/2020

04 May 2020

कुछ लोग -51

वर्तमान में जीते हुए 
कुछ लोग 
भूल जाते हैं 
अपना बीता हुआ कल 
बन जाते हैं मोहरा 
किसी और की चालों के 
जिसके भीतर की 
कालिख से अनजान 
कर  बैठते हैं 
सिर्फ अपने आज में जी कर 
खुद का ही नुकसान।
कुछ लोग 
शायद समझते हैं 
औरों को 
अपने जैसा ही 
कुटिल 
या कुछ अधिक ही सीधा 
लेकिन ऐसा होता नहीं है 
क्योंकि वास्तविकता 
सिर्फ वही नहीं होती 
जो स्याहियों से रची हुई 
दिखती है 
दीवारों पर उकेरी हुई 
या पन्नों पर लिखी हुई। 

-यशवन्त माथुर©
04/05/2020

03 May 2020

सच

झूठ और फरेब की
इस मायावी दुनिया में 
सच सबसे अलग 
कभी बहादुर 
कभी बेबस सा दिखता है 
भावनाओं के कहीं किसी कोने में 
पड़ा  हुआ 
धिक्कारों 
और बरसते पत्थरों के 
अनगिनत वार झेलता हुआ 
इस प्रतीक्षा में रहता है 
कि कहीं 
कोई उसे स्वीकार करके 
बाकी दुनिया को 
दिखा दे 
उसके जीवित होने के प्रमाण। 
सच निष्कपट होता है 
शुद्ध होता है 
नवजात शिशु की तरह 
जिसे  बोध नहीं होता 
भावी तिलिस्मी जीवन का
और जब वह आगे बढ़ता है 
देखता है कई ढंग 
तो उसकी शुद्धता के ऊपर 
जम जाते हैं कई रंग 
जो बदल देते हैं 
उसे हमेशा के लिए। 
अमरत्व का वरदान लिए हुए 
सच सिर्फ 
सच ही रहता है 
यह और बात है 
कि वह भीतर ही होता है 
विपरीत ही होता है 
बहती धारा के 
आदि और अंत के। 

-यशवन्त माथुर ©
03/05/2020

02 May 2020

शब्द

कुछ छूटे हुए शब्द
अधूरे से रुके हुए शब्द
जेहन में कभी आते हैं
खुद से मिट जाते हैं ।

बिल्कुल जीवन की तरह
क्षणभंगुर होते हैं शब्द
कुछ पल ठहर कर
जब जाते हैं, रुलाते हैं।

-यशवन्त माथुर ©
02/05/2020

01 May 2020

वो मजदूर ही हैं



अपने घर जाने की आस में
सब ठीक होने के विश्वास में
पैदल ही मीलों चलते हुए
भूख-प्यास को भूलते हुए
वो मजदूर ही हैं
जो हाथ में एक झोला
और सिर पर गृहस्थी
को ढो रहे हैं
थक-हार कर
जिनके छोटे-छोटे बच्चे
माँ से लिपट कर रो रहे हैं।

वो मजदूर ही हैं
जो दो वक्त की चार-चार रोटी-
सब्जी और अचार पाने के लिए
किसी राजमार्ग पर लगे हुए हैं
लंबी लाइनों में
क्योंकि मशीनों के थमने के साथ
क्योंकि हँसियों और हथौड़ों  के रुकने के साथ
उनकी ज़िंदगी पर जंग लगने लगी है
हर अगली साँस तंग लगने लगी है।

क्या हो रहा है आज क्या कल होगा
क्या इन मुश्किलों का कोई हल होगा ?
या कि बस
कागजी आंकड़ों की
शतरंजी बिसातों  पर
रो-रो कर बीतते दिनों और रातों पर
बिना दिहाड़ी जेबें
उनकी अब तरसने लगी हैं
वो मजदूर ही हैं
जिनकी आँखों से
रिस-रिस कर उम्मीदें कहीं गिरने लगी हैं
मैंने सुना है
उनकी लाशें भी अब मिलने लगी हैं।

-यशवन्त माथुर ©
01/05/2020

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