प्रतिलिप्याधिकार/सर्वाधिकार सुरक्षित ©

इस ब्लॉग पर प्रकाशित अभिव्यक्ति (संदर्भित-संकलित गीत /चित्र /आलेख अथवा निबंध को छोड़ कर) पूर्णत: मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित है।
यदि कहीं प्रकाशित करना चाहें तो yashwant009@gmail.com द्वारा पूर्वानुमति/सहमति अवश्य प्राप्त कर लें।

14 February 2021

क्या होता है प्रेम ?

वो 
जो निर्दयी समाज के ताने-बाने में 
बुरी तरह फँसकर 
पंचायतों के चक्रव्यूहों में उलझ कर 
बलि चढ़ जाता है 
खोखले उसूलों की 
तलवारों से कट कर.... ?

या वो 
जिसे तमाम अग्नि परीक्षाओं से 
गुज़ारकर भी 
ठुकरा दिया जाता है 
एकतरफा करार दे कर 
मजबूर किया जाता है 
एकाकी हो जाने को....?

या फिर वो 
जिसे 'खास' चश्मे से देखकर 
हम सब उतार देते हैं 
अपनी गोरी-काली 
और मोटी-पतली नज़रों से... ?

प्रश्न 
यूं तो बहुत से हैं 
लेकिन सार सबका सिर्फ यही 
कि आखिर क्या होता है प्रेम....?

-यशवन्त माथुर ©
08022021

08 February 2021

एक घटना जिसे मीडिया ने छिपाया : गिरीश मालवीय

खबर वह होती है जो निष्पक्ष तरीके से सबके सामने आए और पत्रकारिता वह है जो जिसमें सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस हो। जिसमें कुछ भी छुपा न हो। लेकिन विगत कुछ वर्षों से बदलाव और विभाजन हर क्षेत्र में स्पष्टतः नजर आ रहा है तो ऐसे में कुछ खबरें अगर जानबूझ कर जन सामान्य के सामने से रोक दी  जाएँ  तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। 

ऐसी ही एक महत्त्वपूर्ण खबर जिसे मुख्यधारा के मीडिया द्वारा प्रमुखता नहीं दी गई, के बारे में श्री गिरीश मालवीय ने  कल (07 फरवरी को )अपनी एक फ़ेसबुक पोस्ट में बताया है, जिसे साभार यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ-

हिंदी मीडिया ने राष्ट्रीय शर्म की एक घटना को पूरी तरह से छिपा दिया क्योंकि इसमें 'अडानी' का नाम हाइलाइट हो रहा था और किसान आंदोलन में अडानी वैसे ही अभी आम जनता के निशाने पर है। 

हम बात कर रहे हैं श्रीलंका द्वारा भारत के साथ किये गए ETC  यानी ईस्ट कंटेनर टर्मिनल के करार के रद्द किए जाने की......स्ट्रैटिजिक मोर्चे पर इस डील का रद्द होना भारत के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। 

भारत, श्रीलंका और जापान की सरकारों ने मई 2019 में एक त्रिपक्षीय ढांचे के रूप में कोलंबो पोर्ट के ईस्ट कंटेनर टर्मिनल के विकास और संचालन के लिए सहयोग के एक ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे .....ये करार श्रीलंका, भारत सरकार और जापान की सरकार के बीच था, जिसमें 51 फ़ीसदी हिस्सेदारी श्रीलंका की और 49 फ़ीसदी हिस्सेदारी भारत और जापान की होनी थी। 

भारत की मोदी सरकार ने किसी सरकारी कम्पनी से यह कांट्रेक्ट पूरा करने के बजाए अडानी को यह पूरा सौदा सौप दिया और घोषणा की गयी कि भारत की ओर से अडानी इस सौदे को पूरा करेगा, जबकि चीन जैसे बड़े देश भी इस तरह के कांट्रेक्ट अपनी सरकारी कंपनियों को ही देते हैं। 

मोदी सरकार यहाँ भूल गयी कि यह भारत नही श्रीलंका हैं यहाँ तो मोदी सरकार की यह दादागिरी चल जाती है कि हर बड़े कांट्रेक्ट अडानी को सौप दिये जाते हैं लेकिन मोदी सरकार का बस श्रीलंका की सरकार पर नही चल पाया। 

श्रीलंका की 23 ट्रेड यूनियंस ने इस तरह से पोर्ट डील का निजीकरण करने का विरोध किया ..........भारत की अडाणी समूह के साथ ECT समझौता सही नहीं है ऐसा भी यूनियंस ने आरोप लगाया......... दरअसल श्रीलंका में बंदरगाहों के निजीकरण के विरोध में एक मुहिम चल रही है. ट्रेड यूनियन, सिविल सोसाइटी और विपक्षी पार्टियाँ भी इस विरोध में शामिल हैं। 

जैसे विभिन्न परियोजनाओं में निवेश को लेकर अडानी समूह का भारत में विरोध होता है, वैसा ही श्रीलंका में भी हुआ, श्रीलंका बंदरगाह श्रमिक संघ के प्रतिनिधियों ने पिछले हफ्ते साफ साफ कह दिया कि वे अभी भी कोलंबो बंदरगाह के ईस्टर्न कंटेनर टर्मिनल में 49 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदने के अडाणी समूह के प्रस्ताव के पक्ष में नहीं हैं...... निजीकरण का विरोध कर रहे ट्रेड यूनियन वालों के साथ  श्रीलंका की सिविल सोसायटी भी  आ गयी उसने भी पूरी तरह से श्रमिक संघो का साथ दिया और श्रीलंका की सरकार को झुकना पड़ा ओर करार रदद् कर दिया गया, प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे ने कहा कि ईस्ट कंटेनर टर्मिनल में 100 फ़ीसदी हिस्सेदारी अब श्रीलंका पोर्ट अथॉरिटी (एसएलएपी) की ही होगी। 

श्रीलंका का प्रमुख अखबार कोलंबो टेलीग्राफ इस सौदे के अडानी एंगल के बारे में लिखा ....... 'ECT के 49% शेयरों को किसी भारतीय कंपनी को सौंपने के प्रस्ताव पर बहुत विवाद हुआ था।  एक नाम का उल्लेख किया गया था और इस नाम से जुड़े पिछले रिकॉर्डों की संदिग्ध प्रकृति के कारण इस मुद्दे की गंभीरता तेज हो गई थी।' 

अखबार का इशारा अडानी की ओर था, ऑस्ट्रेलिया में अडानी को दिलवाईं गयी  खदान की ओर था पिछले साल के आखिर में जब भारतीय टीम क्रिकेट शृंखला खेलने ऑस्ट्रेलिया गई थी तो पहले टेस्ट मैच में सिडनी में ऑस्ट्रेलियाई नागरिक अडानी की परियोजना के विरोध में बैनर लेकर मैदान में आ गए थे।

ऐसा नही है कि मोदी जी और अडानी के इस गठजोड़ की खबर दुनिया को नहीं है विश्व के प्रमुख आर्थिक अखबारों में इस गठजोड़ की आलोचना हो रही है पिछले महीने फाइनेंशियल टाइम्स ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था  कि गौतम अडानी का बढ़ता व्यापारिक साम्राज्य आलोचनाओं का केंद्र बन गया है अडानी की नए करार करने की भूख और राजनीतिक पहुंच ये बात सुनिश्चित करती है कि वो आगे एक केंद्रीय भूमिका निभाने जा रहे हैं। 

कल एशिया के बड़े आर्थिक अखबार एशिया निक्केई ने अडानी ओर मोदी की एक साथ  हंसती हुई तस्वीर लगाकर हेडिंग दिया 'Modi risks turning India into a nation of gangster capitalists'. 
 
कितनी शर्म की बात है, पूरी दुनिया मे भारत के इस क्रोनी केपेटेलिज्म के सबसे बड़े उदाहरण को बेनकाब किया जा रहा है लेकिन यहाँ सब उस पर पर्दा डालने की कोशिश में जुटे हुए हैं। 

निम्न लिंक्स भी देखें-




05 February 2021

आया नहीं बसंत कि बस.......

छायावाद 
हर कलम से 
कागज पर छपने लगा 
आया नहीं बसंत 
कि बस प्रेम दिखने लगा। 

कोई राधा, कोई मीरा 
कोई गोपियों की बात करता है 
कोई संयोग में रमा-पगा 
कोई वियोगी सा 
व्याकुल लगता है। 

किसी को दिखती है 
पीली बहार 
हर तरफ बिखरी हुई सी 
कोई कोयल के सुरों में खोकर 
गुलाबों को सूँघता है। 

लेकिन 
क्या सिर्फ प्रेम ही विषय है 
आज के इस दौर का ?
जरा उसको भी देख लो 
जो अपने हक के लिये लड़ने लगा। 

आया नहीं बसंत 
कि बस प्रेम दिखने लगा। 

-यशवन्त माथुर©
05022021

01 February 2021

नजरिया



एक ही बात का 
एक नजरिया 
बिल्कुल सीधा 
वास्तविक सा 
बिना लाग-लपेट 
जैसा है 
वैसा ही 
दिखने वाला 
मन की कहने वाला 
बिल्कुल सपाट 
और स्पष्ट 
सबसे बेपरवाह 
मौसम का 
हर रूप देखने वाला 
शीत और तपन 
सहने वाला। 



और 
एक नजरिया यह भी 
एक ही तस्वीर को घुमा कर 
अपने मन से 
अपनी कल्पना को 
नये आधार पर 
नये शब्दों से 
नये साँचों में ढालने वाला 
अलग ही दृष्टि से 
कुछ देखने 
और कुछ दिखाने वाला 
अर्थों को सविस्तार 
बताने वाला। 



लेकिन 
फिर भी 
पृष्ठभूमि और किसी कोण में 
कुछ ऐसा होता है 
जो तस्वीर से कट चुका होता है 
निःशब्द 
हो चुका होता है 
और तब  
उसका अस्तित्व 
उसके मूल में रह कर 
अनर्थ की कई परिभाषाएँ 
बहती धारा में 
बहा कर 
अपने कितने ही रूप 
बदल चुका होता है...
नजरिया 
ऐसा ही होता है। 

-(चित्र और शब्द) 
यशवन्त माथुर ©
01022021

31 January 2021

देहरी पर अल्फाज़

समय के साथ चलते-चलते 
नयी मंजिल की तलाश में 
भटकते-भटकते 
कई दोराहों-चौराहों से गुजर कर 
अक्सर मिल ही जाते हैं 
हर देहरी पर 
बिखरे-बिखरे से 
उलझे-उलझे से 
भीतर से सुलगते से 
कुछ नये अल्फाज़ 
जिन्हें गर कभी 
मयस्सर हुआ 
कोई कोरा कागज़ 
तो कलम की जुबान से 
सुना देते हैं 
एक दास्तान 
अपनी बर्बादियों के 
उस बीते दौर की 
जिससे बाहर निकलने में 
बीत चुकी होती हैं 
असहनीय तनाव 
और अकेलेपन की 
सैकड़ों सदियाँ। 

-यशवन्त माथुर ©
31012021

26 January 2021

क्या यह वही देश है?

जो जाना जाता था 
किसान के हल से 
अपने सुनहरे कल से 
जिसके खेतों में फसलें 
झूम-झूम कर 
हवा से ताल मिलाती थीं 
पत्ती-पत्ती फूलों से 
दिल का हाल सुनाती थी 
जहाँ संपन्नता तो नहीं 
संतुष्टि की खुशहाली थी 
महंगी विलासिता तो नहीं 
पर ज़िंदगी गुजर ही जाती थी 
कितना अच्छा था पहले 
वैसा अब आज नहीं 
पहले सुराज था 
आज तो स्वराज नहीं 
आज तो 
बस पल-पल बिगड़ता 
सबका वेश और परिवेश है
जो गणतंत्र था सच में कभी  
क्या यह वही देश है?

-यशवन्त माथुर ©
24012021

20 January 2021

रिश्ते जरूरी नहीं....

रिश्ते जरूरी नहीं रिश्तों के बिना भी अब तक अनजान कुछ लोग अचानक ही
कहीं मिलकर अपने से लगने लगते हैं मीलों दूर हो कर भी उनकी दुआओं के कंपन
संजीवनी के रंगों से
उम्मीदों के कैनवास पर
दिखने लगते हैं।

रिश्ते जरूरी नहीं
रिश्तों के बिना भी
नीरस जीवन की
अनंत गहराइयों तक जाकर
महसूस किया जा सकता है
वास्तविकता के कठोर तल पर
टूट चुकी उम्मीदों के भविष्य का
कोमल स्पर्श।

-यशवन्त माथुर ©
20012021

12 January 2021

शब्द

कितने ही शब्द हैं यहाँ 
कुछ शांत 
कुछ बोझिल से 
उतर कर चले आते हैं 
मन के किसी कोने से 
कहने को 
कुछ अनकही 
सिमट कर कहीं छुप चुकीं 
वो सारी 
राज की बातें 
जिनकी परतें 
गर उधड़ गईं 
तो बाकी न रहेगी 
कालिख के आधार पर टिकी 
छद्म पहचान 
बस इसीलिए चाहता हूँ 
कि अंतर्मुखी शब्द 
बने रहें 
अपनी सीमा के भीतर
क्योंकि मैं 
परिधि से बाहर निकल कर 
टूटने नहीं देना चाहता 
नाजुक नींव पर टिकी 
अपने अहं की दीवार। 

-यशवन्त माथुर ©
12012021

07 January 2021

कुछ लोग -54

दूसरों के सुख से दुखी 
और 
दुख से सुखी महसूस करने वाले 
कुछ लोग 
कभी-कभी 
बेहयायी से 
आने देते हैं 
बाहर 
भीतर के क्रूर 
और वीभत्स रूप को 
क्योंकि 
वे जानते हैं 
सामने वाले की 
मजबूरी 
और मनोदशा को 
क्योंकि 
उन्हें होता है गुमान 
कि समय का कोई भी प्रहार 
भेद नहीं पाएगा 
उनके निर्लज्ज शब्दों की ढाल को 
लेकिन तब भी 
वो दिन 
वो पल आता ही है 
जब बंद पलकों के पर्दे पर 
चलता हुआ 
बीते दौर का चित्र 
कारण बनता है 
उनके विचित्र अवसान का। 

-यशवन्त माथुर ©
07012021

कुछ लोग शृंखला की अन्य पोस्ट्स देखने के लिये यहाँ क्लिक करें। 
+Get Now!