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10 February 2022

दौर बदलना बाकी है ...


कितना कुछ लिख डाला 
और कितना लिखना बाकी है 
शब्दों के मयखाने में 
और कितना पीना बाकी है। 

करता कोशिश कुछ कहने की
लेकिन सुनना बाकी है 
बन जाए जिनसे कोई कविता 
वो अक्षर चुनना बाकी है।  

देखो बसंत की इस हवा को 
और कितना बहना बाकी है 
दूर नहीं दोपहर जेठ की 
बस दौर बदलना बाकी है। 

-यशवन्त माथुर ©
10022022 

02 February 2022

क्या होगा इनबॉक्स में आकर?


क्या होगा
इनबॉक्स में आकर?
क्या होगा
मुखौटा उतारकर 
जो तुम कहना चाहते
मुझे सुनना नहीं
जो मुझे कहना है
पढलो 
मेरी वॉल पर आकर।
क्या होगा
इनबॉक्स में आकर?
रख दोगे
अपना चरित्र
गिरवी अपने शब्दों से
और चाहोगे
मैं गिर जाऊं
तुम्हारी बातों में आकर।
क्या होगा
इनबॉक्स में आकर?
नख-शिख तक
देह-वस्त्र विश्लेषण
क्या करूं
मैं तुमसे पाकर
क्या होगा 
इनबॉक्स में आकर?
अपनी राह पर
तुम चलो
और चलने दो
मित्रता पाकर
भले अगर मानस हो सच में
क्या होगा 
इनबॉक्स में आकर?

(महिलाओं के सोशल मीडिया इनबॉक्स में बेवजह आने वाले शूर वीरों को समर्पित)

-यशवन्त माथुर©
02022022

01 February 2022

भूले हुए रास्ते ....

बीतते समय के साथ 
भूलते हुए 
अपना गुजरा हुआ कल 
हम चलते चले जाते हैं 
अनजान पगडंडियों पर 
जिनपर छूटे हुए 
हमारे कदमों के निशान 
या तो बने रहते हैं स्थायी 
या वह भी 
मिट ही जाते हैं 
एक न एक दिन 
एक कहानी बनकर 
कभी किसी स्वप्न में .. 
किसी और वास्तविकता में 
याद तो आते ही हैं 
हमारे पूरे-अधूरे रास्ते
जिनपर चलकर 
किसी  बीते दौर में 
हमको मिली ही होगी 
अपनी मंजिल 
इसलिए 
भूलना चाहकर भी 
हमारे अवचेतन से 
नहीं निकलते 
भूले हुए रास्ते 
और बीता हुआ कल। 

-यशवन्त माथुर©

26 January 2022

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ....

मेरी आन-बान-शान तिरंगा 
मेरा स्वाभिमान है 
जो कुछ करूँ या सोचूँ 
इस पर हर कतरा कुर्बान है। 

कितने ही गीत लिखे जा चुके 
कितने ही लिखने बाकी हैं 
दुश्मन की छाती पे चढ़ने को 
सिर्फ जयकारे ही काफी हैं। 

कहीं रेत के टीले ऊँचे 
कहीं बर्फीले तूफान हैं 
सीमा की हर बंदिश पर 
जय-जय वीर जवान हैं। 

गणतंत्र के प्रेरक अपने 
तीन रंग, चक्र निशान हैं 
इनके लहराने से मिलती 
हमें अतुल्य पहचान है। 

-यशवन्त माथुर©
25012022 

16 January 2022

अंतराल

स्वाभाविक होता है 
अंतराल..  
कभी 
आत्ममंथन के लिए
कभी 
एकांत चिंतन के लिए  
और कभी 
बस यूं ही 
कुछ पल के 
सुकून के लिए 
भीड़ से दूर 
या भीड़ के बीच भी 
औपचारिक 
आत्मीयता के साथ भी- 
अलग भी 
अंतराल .. 
अपने साथ 
सहेजता है 
कुछ यादें 
और खुद से किए 
कुछ वादे 
क्योंकि 
अंतराल 
अपनी क्षणभंगुरता में 
बो देता है बीज 
किसी और 
भावी अंतराल के। 

-यशवन्त माथुर©
16012022 

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01 January 2022

सबको नया साल मुबारक

सुबह नई, बातें वही
सूरज को नमस्कार मुबारक
परिवर्तन शुभ हो समय का
सबको नया साल मुबारक।

महंगाई को झेल रहे सब
बेरोजगारी के आलम में 
फुटपाथ पे रहने वालों को
महलों के सब ख्वाब मुबारक।

शतरंजी चालों को चलते
चुनावी वादों को करते
भीतर से जो सभी एक हैं
उनको जीत और हार मुबारक।

सबको नया साल मुबारक
उम्मीदों का हर हाल मुबारक
हर 'आम'  खास बने कभी
ऐसा हर एहसास मुबारक।

 सबको नया साल मुबारक।

-यशवन्त माथुर©

19 December 2021

कंक्रीट की सभ्यता

(1)
हर रात
रोशनी के नशे में डूबकर
कंक्रीट की सभ्यता
करती है गुफ्तगू
मखमली पर्दों के बाहर पसरे
सन्नाटे के साथ
खोलती है
अपने भीतर की दुनिया की
कुछ अनकही-
अनदेखी परतें
जिनके ऊपर के मुखौटे
जब मुखातिब होते हैं
दिन के उजाले में
तो ऐसा लगता है
जैसे किसी ऊंचे पेड़ की
हरभरी पत्तियां
शायद अब तक अनजान हैं
सूखती जड़ों
और तने के
खोखलेपन से।

(2)
कंक्रीट की सभ्यता!
हाँ! यह वह सभ्यता नहीं
जो अगर कभी दफन हुई
और अगर कभी
हमारा आधुनिक वर्तमान
प्राचीन हुआ
तो शायद ही 
भविष्य को मिल सकेंगे
विध्वंस के अवशेष
क्योंकि हमने
समय से पहले ही
समय को निचोड़ कर
अपने अमरत्व से
छीन लिया है
भावी 
जीवाश्मों का 
पुनर्जीवन।
.
चित्र व शब्द: 
यशवन्त माथुर©
18122021
.

17 December 2021

वर्तमान समय में शिक्षा की उपयोगिता


शिक्षा मनुष्य की नैसर्गिक और सार्वभौमिक आवश्यकता है। अपने जन्म से मृत्यु पर्यन्त हम किसी न किसी रूप में कुछ न कुछ सीखते ही रहते हैं। चाहे वह माता-पिता की गोद में सभ्यता के स्वाभाविक पाठ सीखना हो या परिवार और मित्रों के परिवेश में ढलना। जो कुछ भी हम सीखते हैं वह शिक्षा ही है। लेकिन क्या सभ्यता और सामाजिक परिवेश के पाठ सीखना ही शिक्षा है? क्या यही शिक्षा की उपयोगिता है? आपका जवाब हां या न कुछ भी हो लेकिन शिक्षा को किसी भी सीमा में बांधा नहीं जा सकता।

 वर्तमान में शिक्षा का उद्देश्य या कहें कि उपयोगिता सिर्फ धनार्जन के एकमात्र लक्ष्य की पूर्ति करना ही रह गया है।और इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए शिक्षार्थी पर परिवार और समाज का भरपूर दबाव रहता है, चाहे उसकी पृष्ठभूमि कैसी भी हो। कुछ इस दबाव को झेल लेते हैं और आगे बढ़ जाते हैं वहीं कुछ ऐसे भी होते हैं जो इस कदर दब जाते हैं कि फिर कभी उठ ही नहीं पाते। और जो उठ नहीं पाते, जो धनार्जन की प्रतियोगिता में पिछड़ जाते हैं, वे अंततः अकेले ही रह जाते हैं। परिवार और समाज का असहयोगात्मक रवैया उन्हें एकाएक मानसिक तनाव की ओर धकेल देता है जिसकी परिणति किसी भी दशा में सकारात्मक तो हो ही नहीं सकती।

तो ऐसे में कोई क्या करे? क्या धनार्जन न करे? क्या सामाजिक और पारिवारिक शिष्टाचार सीख कर कोई अपना निर्वाह कर सकता है? उत्तर सिर्फ एक ही है- संतुलन। क्योंकि असंतुलन का ही हास्यास्पद परिणाम तब देखने को मिलता है जब अच्छे खासे उपाधिधारक विद्वतजन भी अनपढ़ों के चक्रव्यूह में फंसकर उससे पार पाने को छटपटाते नजर आते हैं। इसलिए संतुलन के साथ ही शिक्षा के मूलभूत उद्देश्य और इसकी उपयोगिता को सार्थक बनाया जा सकता है।

[फ़ेसबुक ग्रुप भाव कलश पर 'शिक्षा की उपयोगिता' विषय पर आधारित चर्चा के लिए लिखा गया]

-यशवन्त माथुर©
17122021 

08 December 2021

कुछ लोग-55

कुछ लोग
लगते हैं
देखने से भले
व्यवहार से
हितैषी
लेकिन उनके भीतर
पलता रहता है
विद्वेष
जिसकी झलक
कभी न कभी
दिखती है
उनकी कथनी- 
करनी के अंतर
और उनके चेहरे पर
उभर कर मिटती
आड़ी-तिरछी लकीरों के
आवागमन से। 
यूं तो
विद्वेष
होता है
स्वाभाविक भी
फिर भी
कुछ लोग
अधिकतर नहीं होते संतुष्ट
अपने 
और किसी और के
सुख-दु: ख की
चारित्रिक 
असंगतता से।

-यशवन्त माथुर©
08122021
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