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09 May 2012

गायब हो जाऊं .....

सोच रहा हूँ
कुछ पल को
गायब हो कर
कहीं अपने मे
खो कर
एक कोशिश करूँ
खुद को समझने की
जिसमे असफल रहा हूँ
अब तक 
अपने कमरे मे
मैंने बंद कर दिये हैं
रोशन होने वाले रास्ते
कानों मे भर ली है रुई
और आँखें बंद
खुद को सुनने के लिये
खुद को देखने के लिये
ज़रूरी है-
यह विश्राम
क्योंकि
मन की किताब के
हर पन्ने पर  लिखे
बारीक अक्षर
मेरी समझ मे
जल्दी नहीं आते।

<<<<यशवन्त माथुर >>>>
 

08 May 2012

नया जीवन



पानी की बोतल मे 
अपनी जड़ों का 
एहसास करता 
बड़े पत्तों वाला वह 
मनी प्लांट 
जिसके पत्ते के ऊपर 
निकल आया 
एक और बड़ा पत्ता 
महसूस कर रहा है 
सुकून
इस पत्ते के भीतर 
तिनकों के बिस्तर पर 
आँखें बंद किये 
चिड़िया के नवजात 
शिशुओं का 
बोझ उठा कर
क्योंकि उसे पता है 
एक दिन 
वो भी साक्षी होगा 
शून्य से
अनंत की उड़ान का !

उड़ान -
जो देगी विस्तार 
उस चिड़िया के 
अनंत सपनों को 
कभी तेज़ 
कभी धीमी 
और कभी थमी हुई 
हवा की  
छुअन के साथ
और वो बच्चे 
देखेंगे 
जीवन का सच 
जब कोई बहेलिया 
फैलाएगा जाल
परीक्षा की 
घड़ी में
और तब 
'जीतना' ही होगा 
लक्ष्य
हर हाल में  !

वो मनी प्लांट 
सोच रहा है 
जीवन का आना 
जीते जाना 
चलते जाना 
कितना अच्छा होता है 
निश्छल चहकना 
माँ के आँचल में 
जो बनाती है 
तिनका तिनका जोड़कर 
गुदगुदा सा बिस्तर 
और खुद 
सोती है 
बोतल के किनारे 
हरे बड़े पत्ते की छांव में 
क्योंकि 
एक नया जीवन 
अनमोल है 
उसके लिये !
 
 <<<<यशवन्त माथुर >>>>

05 May 2012

परछाई और मैं

(फोटो : गूगल सर्च )
 कभी साथ चलती है
कभी दूर हो लेती है
खुद की परछाई भी
मजबूर हो लेती है

उसकी मजबूरी मे जब
खुद को तलाशना चाहा
वजह पूछते ही
उसने भागना चाहा

वो बोली कि साथ
इतना ही है तेरा मेरा
मिलना कभी बिछड़ना है
गहरी रात हो या उजला सवेरा

पर एक याद है दोस्ती की
अक्सर जो साथ होती है
परछाई है किस्मत
मजबूरी मे दूर
कभी पास  होती है ।

>>>>यशवन्त माथुर<<<<

03 May 2012

बस यूं ही......

सूई से चुभते फूल
अब सुहाते नहीं है
कोमल से शूल
कुछ सुनाते नहीं हैं

मुंह फुला कर बैठा है
गमले मे गुलाब
गेंदा और बेला
नज़र उठाते नहीं हैं

न जाने क्या हुआ कि
क्यारियाँ भी सूख गयीं
गुलशन जो थे हलक
अब कुछ कह पाते नहीं हैं।

>>>>यशवन्त माथुर <<<<

01 May 2012

मई का पहला दिन (मजदूर दिवस विशेष)



आज
न गणतन्त्र दिवस है
न स्वतन्त्रता दिवस है
न होली है आज
न दिवाली है
न 'सितारों' का जन्म दिन है
न किस्मत के खुलने का दिन है
मई का पहला दिन है
दिन है जो आधार है
मुट्ठी मे बंद संपन्नता का
दिन है जो आधार है
स्वतन्त्रता का
दिन है उनका
जिनके अरमान
शोषण की दीवाली
मनाते हुए
अपेक्षाओं के आसमान मे
हर रोज़ बिखरते  हैं 
और उनकी बारूदी महक
दबा कर रख दी जाती है
सहेज दी जाती है
मौकापरस्ती की होली
एक दिन मनाने को
दिन है उनका
जिनके हाथ
अगर थम जाएँ
खेतों खलिहानों मे
कारखानों मे
तो मयखानों के
सुरूर मे डूबे 
शरीफ
ताकते रह जाएँ अपनी राह
मगर
यह दिन है जिसका
वो जीता है
अपने ही उसूलों पे
गीता के कर्म पे
जीवन के मर्म पे
वो गतिशील है
प्रगतिशीलता के लिये
स्थिरता के लिये
शायद तभी
इतना खामोश है
आज का दिन
मई का पहला दिन। 

>>>>यशवन्त माथुर <<<<

27 April 2012

गनीमत है

बौर बन चुके आम
कीमत बस खास की है
सोच का काम तमाम
आज़ादी बकवास की है। ......
पढ़ना वढ्ना मैं न जानूँ
लढना भिड़ना जानूँ मैं
दोस्त कोई न नाता मेरा
कीमत पूरी मांगू मैं । .........
मैं मैं- मैं मैं
चें चें- पें पें
क्या लिख रहा हूँ
पता नहीं है
झेलने वाले झेल रहे हैं
क्या कहेंगे समझ नहीं है । ........
पेन टूट गया ,खो गयी डायरी
की बोर्ड की अब चढ़ी खुमारी
खटर पटर पर ब्लोगिंग श्लौगिंग
नशा है कोई या अजब बिमारी । .....
किसी को टेढ़ा टेढ़ा लगता
किसी को सीधा सधा सा अक्षर
चश्मा नाक पे चढ़ा मोटा सा
भगा नहीं सकते बैठा मच्छर। .....
हम तो ऐसे ही हैं भैया
शून्य शान सी कीमत है
पढ़ कर पके नहीं अगर आप
अपने लिये यही  गनीमत है
आपके हाथ मे छुपा जो  बैठा
उस टमाटर की कीमत है । :))))


22 April 2012

पृथ्वी दिवस पर.......

बुद्धिजीवियों की
कालोनी से गुजरते
उस रस्ते पर
मैंने देखा
कोलतार की
वह सड़क
चौड़ी
की जा रही थी
बूढ़े पेड़ों को
उनकी
औकात बताई जा रही थी
और उस किनारे
पार्क से
आ रही थी आवाज़--
सड़क के
सामने वाले घर मे
गुज़र करने वाले
सज्जन
माइक पर
कर रहे थे आह्वान
पृथ्वी को बचाने का
पृथ्वी दिवस मनाने का।


18 April 2012

अनजान बन जाऊं (ब्लॉग पोस्ट नंबर-300)

कभी कभी सोचता हूँ
हर चीज़ से
हो जाऊं अनजान
खाली सा हो जाऊं
किसी ब्लैंक
सी डी  या डी वी डी
की तरह
और पहुँच जाऊं
कुछ हाथों मे
जो कुछ भी लिख दें
कुछ भी कह दें
अच्छा या बुरा
जो मन मे हो
और मैं
जान जाऊं
मन के भीतर के
दबे हुए
मौन का सच!

16 April 2012

मैं देखता रहा :(

सरे आम
पिटते देखा उसे
मालिक के हाथों
चाय की दुकान पर
क़ुसूर सिर्फ इतना था
उन मासूम हाथों से
गरम चाय
छलक गयी थी
साहब के जूतों पर
और मैं
चाह कर भी 
बना रहा कायर
क्योंकि
उसकी नौकरी बचानी थी
उसे घर जाकर
माँ के हाथों मे
मजदूरी थमानी थी । 
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