प्रतिलिप्याधिकार/सर्वाधिकार सुरक्षित ©

इस ब्लॉग पर प्रकाशित अभिव्यक्ति (संदर्भित-संकलित गीत /चित्र /आलेख अथवा निबंध को छोड़ कर) पूर्णत: मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित है।
यदि कहीं प्रकाशित करना चाहें तो yashwant009@gmail.com द्वारा पूर्वानुमति/सहमति अवश्य प्राप्त कर लें।

यदि आप चाहें तो हमें कुछ सहयोग कर सकते हैं

17 October 2010

मैं दीया हूँ.

Photo Curtsy:Google Images

जलता हूँ
रोशनी देता हूँ
दुनिया को
सब कुछ सहता हूँ मैं
मगर
विचलित नहीं होता हूँ
जलता रहता  हूँ
निरंतर
अंतिम सांस तक
मैं दीया हूँ
सब कुछ देता हूँ
सब को
मगर मुझे क्या मिलता है
मन में अंधेरी तन्हाई के सिवा
बाती पे ज़ख्मों के सिवा
और फिर रुसवाई के सिवा
लौ के बुझ जाने के बाद
साँसों के उखड जाने के बाद
मेरी यादें रह जाती हैं
मैं वर्तमान से भूत बन जाता हूँ
किसी कविता या कहानी में छप जाता हूँ
यही है मेरा जीवन
मैं दीया हूँ.


[इस कविता को आप सुन भी सकते हैं मेरी आवाज़ में..]






(मैं मुस्कुरा रहा हूँ..)

26 comments:

मॉडरेशन का विकल्प सक्षम होने के कारण आपकी टिप्पणी यहाँ प्रदर्शित होने में थोड़ा समय लग सकता है।

कृपया किसी प्रकार का विज्ञापन टिप्पणी में न दें।

केवल चर्चामंच का लिंक ही दिया जा सकता है, इसके अलावा यदि बहुत आवश्यक न हो तो अपने या अन्य किसी ब्लॉग का लिंक टिप्पणी में न दें, अन्यथा आपकी टिप्पणी यहाँ प्रदर्शित नहीं की जाएगी।

  1. आपकी इस सुंदर भावों वाली कविता को पढ़कर मुझे अपनी एक ग़ज़ल का एक शेर लिखने की इच्छा हो रही है-

    ख़ुदपरस्ती के अंधेरे में भला कैसे जिएं,
    देख जैसे जल रहे हैं ये दिए मेरी तरह।

    दशहरे की हार्दिक शुभकामनाएं।

    ReplyDelete
  2. विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनायें।

    आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (18/10/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा।
    http://charchamanch.blogspot.com

    ReplyDelete
  3. Beautiful creation and a bitter truth as well.

    ReplyDelete
  4. बहुत सुन्दर रचना
    विजयादशमी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं
    ----------------
    मेरा जन्मदिवस - २ (My Birthday II)

    ReplyDelete
  5. बहुत पसन्द आया
    शब्दों को चुन-चुन कर तराशा है आपने ...प्रशंसनीय रचना।
    अहसासों का बहुत अच्छा संयोजन है ॰॰॰॰॰॰ दिल को छूती हैं पंक्तियां ॰॰॰॰ आपकी रचना की तारीफ को शब्दों के धागों में पिरोना मेरे लिये संभव नहीं


    विजयादशमी की बधाई एवं शुभकामनाएं

    ReplyDelete
  6. मगर मुझे क्या मिलता है
    मन में अंधेरी तन्हाई के सिवा
    बाती पे ज़ख्मों के सिवा
    और फिर रुसवाई के सिवा

    बहुत अच्छी लगी आपकी रचना !

    ReplyDelete
  7. मेरी प्यारी सी चिन्मयी- तुम्हें विशेष धन्यवाद यहाँ आने के लिए.और हाँ इसी तरह हमेशा मुस्कुराती रहना.



    आदरणीय महेंद्र जी,वंदना जी,दिव्या जी,तृप्ति जी,संजय जी,-आप का बहुत बहुत धन्यवाद इस कविता को पसंद करने के लिए.



    महेंद्र जी -आप की ग़ज़ल की ये पंक्तियाँ पढ़ कर बहुत अच्छा लगा.

    ReplyDelete
  8. सुंदर भाव, सुंदर आवाज। इस नन्हें ब्लॉगर पर भला कौन नहीं करेगा नाज़?

    ReplyDelete
  9. माफ़ कीजियेगा जाकिर जी...शायद आपने मेरा प्रोफाइल नहीं देखा....मैं २७ साल का छोटा सा बच्चा हूँ.ha ha ha
    वैसे मेरे ब्लॉग पर आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!

    Thanks a lot to Anupama Ji...

    ReplyDelete
  10. शब्द और आवाज़ दोनों कमाल ...... यशवंत
    बहुत अच्छी रचना और उतने ही अच्छे से उसकी प्रस्तुति ......

    ReplyDelete
  11. आपकी आवाज़ सुनकर तो और भी अच्छा लगा.... आपको तो कितनी चीज़ें आती हैं... :(

    ReplyDelete
  12. लौ के बुझ जाने के बाद
    साँसों के उखड जाने के बाद
    मेरी यादें रह जाती हैं
    मैं वर्तमान से भूत बन जाता हूँ

    बहुत ही सुन्‍दर एवं भावमय प्रस्‍तुति, ''सदा'' पर आपके प्रथम आगमन का स्‍वागत है ।

    ReplyDelete
  13. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति। हमें ज़िन्दगी में दिया ही बनना चाहिए जो दूसरों को प्रकाश दे।

    ReplyDelete
  14. Sweetheart CHAITANYA,
    Respected Monika ji,Sada ji,Hasyfuhaar ji--aap sab ka bahut bahut bahut aabhaar.

    ReplyDelete
  15. बेहद सुन्दर प्रेरणादायी प्रस्तुति .............

    ReplyDelete
  16. बहुत ही सुन्दर...
    सादर बधाई....

    ReplyDelete
  17. कविता तो अच्छी है ही, पहली बार आप को सुनना भी अच्छा लगा। अभिव्यक्त अच्छी तरह से किया है आपने। बधाई।

    ReplyDelete
  18. वाह, अच्छी कविता
    बहुत बढिया

    ReplyDelete
  19. bahut sundar..yashwant...diye ke dard ko bakhubi ukera hai shabdon me..

    ReplyDelete
  20. बहुत सुन्दर रचना...

    ReplyDelete
  21. बहुत सुन्दर भाव हैं कविता के .सुन नहीं पाई हूँ अभी.फिर आउंगी.

    ReplyDelete
  22. बहुत सुन्दर....
    सूरज न बन पाए तो बन के दीपक जलता चल....!!

    ***punam***
    bas yun...hi...
    tumhare liye...

    ReplyDelete

Popular Posts

+Get Now!