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23 October 2010

चलते चलना है.....

(फोटो साभार:गूगल)


ये जीवन है
चलते चलना है
हर राह पर
हर मोड़ पर
ढेरों ढलानों
पर फिसलते हुए
चढ़ाइयों पर चढ़ते हुए
हवा के रुख की तरफ कभी
कभी हवा को धकेलते हुए
बस चलना है
चलते चलना है.......
बहते आंसुओं को पीते हुए
हँसते हुए
दौड़ते हुए
काँटों पर चलते हुए
आग उगलती ज़मीं पर चल कर
कभी यूँ ही ठिठुरते हुए
मीलों दूर
चलना है
चलते चलना है
ठोकरें खानी है
उठना है
संभलना है
नहीं तनिक विश्राम इस पर 
ये जंग ए  ज़िन्दगी की राह है
चलना है
बस चलते चलना है
निरंतर....


(मैं मुस्कुरा रहा हूँ..)

8 comments:

  1. चलते चलना है
    ठोकरें खानी है
    उठना है
    संभलना है
    नहीं तनिक विश्राम इस पर
    ये जंग ए ज़िन्दगी की राह है
    सुन्दर प्रेरक रचना। बधाई।

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  2. चलते चलना है
    ठोकरें खानी है
    उठना है
    संभलना है
    यश(वन्त)जी आपने तो समा बाँध दिया ...बहुत ही ख़ूबसूरत रचना.

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  3. बस चलते चलना है
    निरंतर....
    Miles to go before I sleep !
    This reminds me of Robert Frost... Forest are lovely dark and deep ....

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  4. बिलकुल सही कहा है.....
    चलते जाना ही जिन्दगी है ...
    बहुत सुन्दर रचना !

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  5. chalte chalen!
    sundar rachna!
    shubhkamnayen....

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  6. मीलों दूर
    चलना है
    चलते चलना है
    ठोकरें खानी है
    उठना है
    संभलना है
    नहीं तनिक विश्राम इस पर
    ये जंग ए ज़िन्दगी की राह है
    बहुत ही अर्थपूर्ण और आशावादी सोच के साथ संघर्ष की बात .... अच्छा लगा पढ़कर....

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  7. सुन्दर, चरैवैति-चरैवैति....

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  8. आदरणीया निर्मला जी,हरदीप जी,अनुपमा जी,मोनिका जी,संजय जी एवं श्याम जी,आप सभी को बहुत बहुत धन्यवाद इस कविता को पसंद करने के लिए.

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