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01 April 2012

मूर्ख ही तो हैं

आप सभी को मुझ मूर्ख की ओर से मूर्ख दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ :) और चूंकि आज राम नवमी भी है इसलिए उसकी शुभ कामनाएँ भी स्वीकार कीजिये। यह रचना नयी नहीं है  बल्कि   ठीक एक वर्ष पूर्व इसी ब्लॉग पर प्रकाशित हो चुकी है और आज एक बार पुनः प्रस्तुत है ---
 
फुटपाथों पर जो रहगुज़र किया करते हैं 
सड़कों पर जो घिसट घिसट कर चला करते हैं 
हाथ फैलाकर जो मांगते हैं दो कौर जिंदगी के 
सूखी छातियों से चिपट कर जो दूध पीया करते हैं 
ईंट ईंट जोड़कर जो बनाते हैं महलों को 
पत्थर घिस घिस कर खुद को घिसा करते हैं 
तन ढकने को जिनको चीथड़े भी नसीब नहीं 
कूड़े के ढेरों में जो खुद को ढूँढा करते हैं 
वो क्या जानें क्या दीन क्या ईमान होता है 
उनकी नज़रों में तो भगवान भी बेईमान होता है 
ये जलवे हैं जिंदगी के ,जलजले कहीं तो हैं 
जो इनमे भी जीते हैं, मूर्ख ही तो हैं.

-यशवन्त यश ©


30 comments:

  1. बहुत सुन्दर अभियक्ति यशवंत जी, छू गयी दिल को...
    सादर

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  2. गहरी अभिव्यक्ति. हृदयस्पर्शी....

    रामजी को नमन

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  3. यथार्थवादी रचना... रामनवमी की शुभकामनाएं ...

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  4. बहुत सुन्दर....गहन रचना यशवंत.....

    आपको भी रामनवमी की शुभकामनाएँ......

    ((और मूर्ख दिवस की शुभकामनाएँ हम क्यों ले भाई?? :-) ))

    सस्नेह.

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  5. कूड़े के ढेरों में जो खुद को ढूँढा करते हैं ...बहुत गहन अभिव्यक्ति..

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  6. bahut badhia yashwant bhai...

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  7. badhiya kavita.. ek varsh purani to bilkul nahi lag rahi... shubhkaamnayen

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  8. Receive on mail

    indira mukhopadhyay ✆ indumukho@gmail.com

    3:23 PM (0 minutes ago)

    to me
    ये जलवे हैं जिंदगी के ,जलजले कहीं तो हैं
    जो इनमे भी जीते हैं, मूर्ख ही तो हैं.
    bahut khub. Ramnavmi ki shubhkamnayen.

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  9. एक कटु यथार्थ का इतना सुन्दर चित्रण वाकई काबिले तारीफ़ है.

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  10. deep and intense expressions Yash..
    wish u the same !!

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  11. गहन अभिव्यक्ति...
    रामनवमी की शुभकामनाएँ...मूर्ख दिवस की भी.

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  12. वाह ! बहुत ही सुन्दर ढंग से व्यक्त किया है..

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  13. बहुत ही अच्छा लिखा है..
    गरीबो के दर्द को समझा..
    बहुत ही मार्मिक प्रस्तुति है....

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  14. वाह!!!!!बहुत सुंदर बेहतरीन मार्मिक भाव अभिव्यक्ति,यशवंत जी

    MY RESENT POST...काव्यान्जलि ...: तुम्हारा चेहरा,

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  15. असहाय सच .....!

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  16. बहुत ही प्यारी कविता....

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  17. सुभानाल्लाह......बहुत ही खूब पिछले साल का तो याद नहीं हमने तो अभी पढ़ी......बहुत ही शानदार है पोस्ट.........हैट्स ऑफ इसके लिए ।

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  18. ये शब्द चित्र है उस हिन्दुस्तान का जिसकी ग्रोथ रेट के बड़े चढ़े चर्चे हैं .

    कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए ,(कचरा बीनते हुए ) मैंने पूछा नाम तो -

    बोला के हिन्दुस्तान है .

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  19. वो क्या जानें क्या दीन क्या ईमान होता है
    उनकी नज़रों में तो भगवान भी बेईमान होता है ....
    तीखा ..एकदम तल्ख़

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  20. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ... आने में कुछ विलम्‍ब अवश्‍य हो गया है ... :)

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  21. मूर्ख दिवस पर एक गम्भीर सोच

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  22. सत्य को कहती अच्छी रचना

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  23. गहन अभिव्यक्ति ...मन उद्वेलित कर गई ....

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  24. आने में कुछ विलम्‍ब अवश्‍य हो गया है ,गहन अभिव्यक्ति .

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  25. क्या बात है,भगवान भी बेईमान होता है........
    सुंदर अभिव्यक्ति.

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  26. बहुत सुन्दर और मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति...

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  27. यह हर युग की दास्तान है। जीवन का असली स्पंदन भी इन मूर्खों के पास ही नसीब होता है।

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