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12 April 2012

कोयल की आवाज़ सुनी

कोयल की आवाज़ सुनी
वो कुहुक रही थी
आज अचानक
मेरे घर की बालकनी में
आकर
अंदर के कमरे में
बैठा मैं
चारों ओर घूमती
उसकी नज़रों को
भाँप रहा था
शायद वो
ढूंढ रही थी
सामने के
आम के पेड़ पर बना 
अपना आशियाना
शायद वो
ढूंढ रही थी
उन बौरों को
जिनकी मंद मंद
खुशबू के बीच 
वो गाती है
अपने राग
पर तभी
उसकी नज़रों ने देख ली
ज़मींदोज़ हो चुके
उस हरे भरे
आम के पेड़ की गति
और इंसान को
कोसती हुई 
वो कोयल उड़ गयी
नये ठिकाने की
तलाश में  !

(काल्पनिक )

35 comments:

  1. बहुत सुन्दर ,हार्दिक बधाई ...

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  2. har chdiya ko us jana hota hai ek din....

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  3. कोयल का चमन उजड़ रहा है आजकल..
    kalamdaan

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  4. बहुत ही खुबसूरत लगी पोस्ट....शानदार।

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  5. सार्थक शब्द संयोजन

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  6. क्या बात है बहुत बहुत प्यारी कविता .....खूबसूरत

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  7. बेहतरीन पंक्तियाँ ! बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति !

    मैं ब्लॉग जगत में नया हूँ मेरा मार्ग दर्शन करे !
    http://rajkumarchuhan.blogspot.in

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  8. आम के पेड़ की गति
    और इंसान को
    कोसती हुई
    वो कोयल उड़ गयी
    नये ठिकाने की
    तलाश में !

    कोयल तो नया ठिकाना ढूंढ़ ही लेगी .... !!
    इंसान अपने अक्ल को कब ढूंढेगा .... ?

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  9. कोयल की बोली में आपने इंसान को एक बार फिर उसकी करनी याद दिला ही दी ...सच थोडीसी अहतियात से कितने आशियाने बच जाते ....मनुष्य अब भी चेत जाये तो गनीमत है ......! सुन्दर !!!

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  10. काल्पनिक ही सही लेकिन दिल को तो छू गयी....

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  11. इसलिए आजकल कोयल गाती नहीं कुछ चीखती सी प्रतीत होती है... गहन भाव

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  12. बहुत अच्छे भाव संजोये है यशवंत..............

    संध्या जी शायद ठीक कह रही हैं ..कोयल आज कल गाती नहीं, चीखती है.....

    बहुत सुंदर.

    सस्नेह.

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  13. काल्पनिक होगा पर लग तो रहा है यथार्थ सा!
    यही वस्तुस्थिति तो है वर्तमान में...
    सुन्दर अभिव्यक्ति!

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  14. वाह ...बहुत ही बढिया।

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  15. काल्पनिक है...पर यथार्थ तो यही है|
    सुंदर अभिव्यक्ति.

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  16. koyal hi kya chidiya, kabutar aadi sabhi isi tarah insaan ko koste honge....satya prakat karti sundar rachna

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  17. उत्कृष्ट प्रस्तुति |
    बहुत बहुत बधाई ||

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  18. इंसान को पता नहीं कि आम क्यों मीठे होते हैं और कोयल के स्वर क्यों मीठे होते हैं. केवल कोयल जानती है कि इन मिठासों के गीत गाने वाला इंसान इन मिठासों की रक्षा नहीं करता बल्कि उसे नष्ट करता है. सुंदर रचना.

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  19. side effects of extreme urbanization !!

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  20. बहुत प्यारी कविता....विचारणीय भाव लिए .

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  21. सुन्दर कविता ...आभार

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  22. आज शुक्रवार
    चर्चा मंच पर
    आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति ||

    charchamanch.blogspot.com

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  23. कोयल के माध्यम से गहन बात....खूब !!!!

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  24. खूबसूरत भाव समेटे एक प्यारी सी कविता .....

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  25. बहुत सुन्दर !

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  26. बहुत खूब ......आभर

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  27. भावनाओं का बहुत सुंदर चित्रण...
    शुभकामनायें.

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  28. आज कोयल को उड़ना पड़ा है...कल उस हँसा को भी उड़ना पड़ेगा जो तन रूपी वृक्ष में रहता है.

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  29. एक विचारणीय मुद्दे पर बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति........ यदि यही हाल रहा तो शायद ये कोयल की कूंक भी कहीं सुनने को इंसान तरस जाए!

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  30. अभी भी यदि जागरुकता नहीं आई तो कोयल की कूक मोबाइल की रिंग टोन बनकर रह जायेगी.

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  31. मार्मिक ! विकास के उपक्रम में मानव कितने प्राणियों का बसेरा छीन चुका है और यह विकास निर्विकार अपने कदम तेज़ई से बढाए जा रहा है।
    संवेदना से भरी सुंदर अभिव्यक्‍ति !

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  32. परिंदों का बसेरा छीनता इंसान और पंछियों का दुख ....अच्छी रचना

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