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19 January 2013

कोशिशें जारी हैं

मनोबल
एक ऐसी दीवार होता है
जिसकी नींव
कभी कभी संशय में रहती है
कभी तन कर
अपनी जगह
बनाए रखती है दीवार को
और कभी
एक ठोकर में ही
ढह जाने देती है

मेरा मन
मेरा मनोबल
स्थिर है
चिकने घड़े की तरह
बे परवाह है
फिर भी
लातों की
कोशिशें जारी हैं
विध्वंस को
अंजाम देने की। 

©यशवन्त माथुर©

7 comments:

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  1. कोशिशें जारी हैं
    विध्वंस को
    अंजाम देने की।
    मुद्दई लाख बुरा चाहे तो क्या होता है .....
    होता वही ,जो मंज़ूरे ख़ुदा होता है .....

    ReplyDelete
  2. सुंदर भावअभिव्यक्ति,,,यशवंत जी,,,

    recent post : बस्तर-बाला,,,

    ReplyDelete
  3. सुन्दर अभिव्यक्ति ... शुभकामनायें

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  4. kosishe hi to kaamyaab hoti hai.... behtreen post...

    ReplyDelete
    Replies
    1. शायद आप इस पोस्ट को नहीं समझ पाईं सुषमा जी :)

      Delete
  5. हमारा मन ही मनोबल को अपनी जगह स्थिर रख सकता है ..
    बस मन को थामे रखिये ..
    दुनिया तो हमें अस्थिर करने की कोशिशें करती रहती है ..आदत जो है ..
    kalamdaan

    ReplyDelete
  6. और इसे कभी टूटने भी न देना ...यही तो हमारा संबल है...:)

    ReplyDelete

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