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19 August 2013

पटरी पर जिंदगी

(चित्र साभार-अविनाश कुमार चंचल जी )
(1)
भागती है
अपनी पटरी पर
सरपट ये जिंदगी
देखती है
और सहेजती है
दौड़ लगाती
धरती और पेड़ों को
ऊंचे पुलों को
बहती-सूखी नदियों को
चलती बसों-ट्रकों
आते जाते लोगों
और सुनसान सड़कों को
जो दिन मे गुलज़ार रहती हैं
अमीरों को मस्ती में
और कराहती हैं हर रात को
हरे ज़ख़्मों पर छिटके
नमक की टीस से ।

(2)
यादों की भीड़ से
ठसाठस भरी
यह जिंदगी की रेल
आने वाले मुकामों पर
थोड़ा ठहर कर
कभी खुद से बातें करती है
कभी औरों की बातें सुनती है 
न जाने किस तरह
बुनते हुए चित्र
हर आने वाले पल का
और चलती रहती है
अपनी पटरी पर
सदा की तरह। 

~यशवन्त माथुर©
(पत्रकार अविनाश कुमार चंचल जी के फेसबुक चित्र से प्रेरित)

11 comments:

  1. सच जिंदगी भी रेल की पटरी की तरह चलती रहती चलती रहती है .... बढ़िया रचना !!

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  2. और चलती रहती है
    अपनी पटरी पर
    सदा की तरह। sahi bat har ghatna se pare rahkar .....

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति। ।

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  4. खूबसूरत अभिव्यक्ति
    कल बिहार में कुचल गई कई जिंदगी
    वैसे रोज कहीं ना कहीं लील जाती है
    नेताओ को मौका दे जाती है गाल बजाने का मौका

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  5. रेल की पटरी पर भागती जिन्दगी... सुंदर बिम्ब !

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  6. चलती है ये रेल ओर यादें कम नहीं होती ... इस रेल में बढती जाती हैं यादें ... ओर भरता भी नहीं कम्पार्टमेंट ...

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  7. यादों की भीड़ से
    ठसाठस भरी
    यह जिंदगी की रेल

    जो सवार हैं यादें ज़िन्दगी की रेल पर, सफ़र कट ही जाएगा!

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  8. रेलगाड़ी का मानवीकरण कर जीवन के रंगों में रंगी रचना

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  9. यशवंत भाई .दिल को छो गयी कविताएं और सच में कविताएं नहीं है .. बहुत कुछ है ...

    दिल से बधाई स्वीकार करे.

    विजय कुमार
    मेरे कहानी का ब्लॉग है : storiesbyvijay.blogspot.com

    मेरी कविताओ का ब्लॉग है : poemsofvijay.blogspot.com

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  10. सच है यह जिंदगी एक रेल ही तो है
    बहुत सुन्दर

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