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23 July 2015

सितारों से आगे की उलझन - हरजिंदर, हेड-थॉट, हिन्दुस्तान


वैज्ञानिकों की सोच के भी दौर चलते हैं। कुछ वैसे ही, जैसे सभ्य समाजों में फैशन के चलते हैं। आज जो आमतौर पर सोचा जा रहा है, कल भी वैसे ही सोचा जाएगा, यह जरूरी नहीं है। अभी कुछ दशक पहले की ही बात करें, तो ज्यादातर वैज्ञानिक यह मानकर चलते थे कि जीवन अगर कहीं है, तो धरती पर ही है। इस सोच के पीछे यह धारणा थी कि हमारे ग्रह पर जो जीवन है, वह अतीत की तमाम रासायनिक दुर्घटनाओं का परिणाम है। यह एक लंबी और जटिल प्रक्रिया से उपजा है। जो रासायनिक दुर्घटनाएं और जटिल प्रक्रियाएं इस धरती पर हुई हैं, वैसी ही दुनिया में कहीं और भी हुई हों, इसकी संभावना लगभग नहीं है। एक सर्वेक्षण हुआ था, जिसमें पाया गया था कि ज्यादातर वैज्ञानिक यह नहीं मानते कि ब्रह्मांड में कहीं और भी जीवन होगा। हालांकि मामला उनके मानने या न मानने का नहीं था, अनंत आकाश रहस्यमय चमक के लिए तरह-तरह की कल्पनाएं बुनना हमारी पुरानी फितरत रही है। इस फितरत ने न सिर्फ कल्पना और कथा लोक को बुना है, बल्कि यह हमारे धर्मों और पुराणशास्त्र का भी हिस्सा रहा है। लेकिन वैज्ञानिक इससे ज्यादा आगे नहीं सोचते थे। अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के वैज्ञानिक डेविड मोरिसन यहां तक कहते थे कि दूसरे ग्रह के वासी सिर्फ कल्पना का नतीजा हैं, और कुछ नहीं।

इसलिए, अभी तीन माह पहले ही नासा के प्रमुख वैज्ञानिक एलेन स्टेफने ने जब यह दावा किया कि वैज्ञानिक अगले दस साल में दूसरे ग्रह के वासियों यानी एलियन को ढूंढ़ निकालेंगे, तो हर किसी को हैरत हुई थी। लेकिन अब ऐसा लगता है कि वैज्ञानिक समुदाय के ज्यादातर लोग  एलियन के अस्तित्व पर नहीं, तो उसकी संभावनाओं पर जरूर यकीन करने लगे हैं। दिलचस्प यह है कि इसमें संभावनाएं सिर्फ वैज्ञानिकों को नहीं, उद्योगपतियों को भी नजर आने लगी हैं। बात सिर्फ  इतनी ही नहीं है, वैज्ञानिकों और उद्योगपतियों ने मिलकर एलियन को खोजने के लिए करोड़ों डॉलर की एक परियोजना भी शुरू कर दी है, जिसमें एक तरफ प्रख्यात वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग शामिल हैं, तो दूसरी तरफ रूसी अरबपति यूरी मिलनर। सारे तर्क अब अचानक ही बदल गए हैं। अब कहा जा रहा है कि ब्रह्मांड में चार अरब से ज्यादा ग्रह-उपग्रह मौजूद हैं, जिनमें लगभग चार करोड़ तो ऐसे हैं ही, जहां जीवन लायक स्थितियां हो सकती हैं। और हो सकता है कि इनमें से किसी में कुछ जीवाणु, कुछ कीटाणु या किसी और तरह के जीव-जंतु सांसें ले रहे हों। फिर वह कल्पना तो खैर है ही कि हो सकता है कि हम किसी ऐसी दुनिया को भी खोज लें, जहां के लोग हमसे ज्यादा बुद्धिमान हों, या हमसे ज्यादा खतरनाक हों। या हो सकता है कि कहीं ऐसी सभ्यता भी हो, जो हमसे कहीं ज्यादा विकसित हो, और आज हम जिन समस्याओं में सिर खपा रहे हैं, उनके हल वह बहुत पहले ही तलाश चुकी हो।
शायद इस सोच के बदलने के पीछे एक कारण और भी है। धरती के भविष्य को लेकर आशंकाएं बढ़ती जा रही हैं। ज्यादातर वैज्ञानिक मानते हैं कि लगातार गरम होती धरती ग्लोबल वार्मिंग की ओर बढ़ती जा रही है, कुछ थोड़े-से ऐसे भी हैं, जो मानते हैं कि धरती पर हिमयुग भी वापस आ सकता है। जो भी हो, अगर पर्यावरण बदला, तो धरती का मौसम उतना सुहाना तो नहीं ही रहेगा, जितना सुहाना वह अब है। हो सकता है कि वह रहने लायक ही न रहे। स्टीफन हॉकिंग मानते हैं कि ऐसे में मानव जाति को बचाने का एक ही तरीका होगा कि आपात स्थितियों में हम सब किसी उस ग्रह पर जाकर बस जाएं, जहां के हालात हमारे अनुकूल हों। इसलिए अभी से ऐसे ग्रहों की खोज बहुत जरूरी है। जाहिर है, यह अपनी पूरी दुनिया को, यानी अपने शहर, अपने घर, अपने स्कूल, अपने उद्योग दूसरी जगह बसाने का मामला है, इसलिए इसमें उद्योगपतियों की दिलचस्पी को भी समझा जा सकता है।

ये उद्योगपति क्या सोच रहे हैं, यह तो पता नहीं है, लेकिन वैज्ञानिक कम-से-कम इतना तो जानते ही हैं कि यह काम आसान भी नहीं है। पूरे ब्रह्मांड के हिसाब से देखें, तो हमारे सौर्य मंडल का लाल ग्रह, यानी मंगल धरती से बहुत दूर भी नहीं है, लेकिन मंगल पर जीवन है या नहीं, इसे समझने के लिए हम कई दशक से जुटे हैं, लेकिन अभी तक कुछ भी जान नहीं सके। हर बार जितना जान पाते हैं, पहेली उससे ज्यादा उलझ जाती है। यह बात अलग है कि जितना ज्ञान अभी तक है, उसके आधार पर ही वहां लोगों को ले जाने की शटल सेवा चलाने, प्लॉट काटकर बेचने और बस्ती बसाने का धंधा कुछ लोगों ने जरूर शुरू कर दिया है। इन सबसे अलग यह एक लंबा और कठिन काम है, इसके लिए निरंतर भगीरथ प्रयत्न और बड़े निवेश की जरूरत है। जीवन को खोजने में हम सफल हो पाते हैं या नहीं यह एक अलग बात है, लेकिन इस कोशिश से हम अपने ब्रह्मांड को और खुद अपने आप को ज्यादा बेहतर ढंग से समझ सकेंगे। और शायद उन कुछ पहेलियों को भी सुलझा लें, जो अक्सर हमें परेशान करती रहती हैं। लेकिन एक सवाल इस खोज से भी ज्यादा बड़ा है। हो सकता है कि हम सचमुच एलियन को खोज लें, या हो सकता है कि हम अंतिम रूप से इस नतीजे पर पहुंच जाएं कि इस धरती के अलावा कहीं और जीवन नहीं है।

ऐसे में, उस कल्पना लोक, उस कथा लोक, उन सांस्कृतिक मिथकों का क्या होगा, जिनको मानव ने अपनी सभ्यता की अभी तक की यात्रा में बुना और गुना है? क्या ऐसी एक खोज सब कुछ खत्म कर देगी? हमारे कल्पना लोक, हमारे पुराण शास्त्र भी मानवीय प्रयासों के उतने ही महत्वपूर्ण परिणाम हैं, जितना कि हमारा विज्ञान। शायद यह आशंका सही नहीं है, क्योंकि विज्ञान का अभी तक का अनुभव तो यही बताता है कि कोई भी सच जब सामने आता है, तो अपने साथ शक और शुबहों की बहुत सारी नई गंुजाइश भी लाता है। हर बार नए उजागर हुए सच से विज्ञान को खड़े होने का नया आधार जरूर मिलता है, पर इसके साथ ही हमारे कल्पना लोक को उड़ान भरने का एक नया आसमान भी मिलता है।

सच के साथ ही जुड़ा हुआ एक सच यह भी है कि सच से अक्सर तुरंत ही सोच बदलती नहीं है, बस हर तरह की सोच आगे बढ़ती है। यह जरूर है कि धीरे-धीरे बहुत-सी सोच और धारणाएं लुप्त होने लगती हैं, धारणाओं की दुनिया में प्रगति ऐसे ही होती है। कोई एलियन इसे रातोंरात नहीं बदल सकता।

साभार-'हिंदुस्तान' 22/07/2015 

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